Sunday, 13 October 2013

लघुता में विराटता - वीरेंद्र आस्तिक

बात डॉ  नगेन्द्र के कथन से शुरू करता हूँ। वे कहा करते थे- ‘स्थापितों का मूल्यांकन और उनकी व्याख्या तो बार-बार हो सकती है, उनकी आलोचना भी बार-बार हो सकती है, किन्तु उन पर शोध् नहीं। शोध् तो अज्ञात को ज्ञात करना है। उपेक्षितों को स्थापित करना है।’ डॉ नगेन्द्र की बात मेरी समझ में भी आई। हमारे साहित्य समाज मंे और शैक्षिक संस्थानों में तो स्थापितों को ही बार-बार स्थापित किया जाता है। ऐसे ही वातावरण से ऊबकर कभी नामवर जी ने भी कहा था- ‘विश्वविद्यालय और शैक्षिक संस्थान प्रतिभा घोंटू संस्था में बदल चुके हैं।’ बहरहाल ऐसी अवधरणाओं को मान्य ठहराते हुए  डॉ विमल ने एक महत्वपूर्ण शोध् करवाया, अनुसंधता थीं डॉ शकुंतला राठौर। उन्होंने छायावाद के लगभग 36 गौणकवियों का अनुसंधन किया। इस शोधकार्य द्वारा छायावाद की कई पूर्व स्थापनाएँ निरस्त हुईं और कई पर नई रोशनी पड़ी, जिसकी भूरि-भूरि प्रशंसा डॉ नगेन्द्र और नामवर जी दोनों ने की। 

कहना चाहूँगा कि युवा रचनाकार ही सबसे अध्कि उपेक्षित होते हैं। युवा रचनाकारों के उपेक्षित होने का अर्थ है- हम स्थापित और मान्य अवधरणाओं की सहूलियत के आगे मौलिक और नवीन चेतना पर बात करने की जहमत उठाना नहीं चाहते। डॉ विमल ने जहमत उठाई तो कुछ युवा और गौण रचनाकार स्थापित हुए, साथ ही शोध् संस्थानों की जड़वत परम्परा भी टूटी। लेकिन यह सफलता तब तक एक अपवाद ही मानी जाएगी, जब तक ऐसे शोध् कार्य प्रचलन में न आ जाएँ। 

किसी युवा रचनाकार के पहले काव्य संग्रह से गुजरने के बाद जेहन में इतिहास के उपरोक्त प्रसंगों का ताजा हो जाना कृति के प्रति एक सार्थक संकेत ही है। साहित्य में युवा रचनाकारों का पैर- जमाऊ कार्य मुझे आश्वस्त करता रहा है। मैंने देखा है, अपार-अगम भ्रष्टाचारी दलदल के बीच कम उम्र का साहस। कामयाबी के संघर्ष में एक-एक पंखुड़ी को जोड़ते हुए कमलवत होने की अभीप्सा को जीवित रखना कोई आसान कार्य नहीं। लेकिन हैं ऐसे साहित्य समर्पित सिपाही जिनका गीत प्रादुर्भूत होता है- नोन, तेल, लकड़ी से लेकर साहित्य, शिक्षा और नौकरी तक के आसन्न संकटों के बीच। 

ऐसे ही युवा रचनाकार हैं अवनीश सिंह चैहान। अवनीश की पाण्डुलिपि जब मेरे पास आई तो कृति-शीर्षक ही देखकर मन विस्मय से भर उठा- ‘टुकड़ा कागज़ का।’ यह ‘टुकड़ा कागज़ का’ मुझे दिखाने लगा सपनों की दुनिया। तत्क्षण मैंने पहले यही गीत पढ़ा। आह! ‘टुकड़ा कागज़ का।’ यह एक रूपक गीत है। यह उस लाखैर आदमी की भुक्त-कथा है जो क्रूर समय के थपेड़ों की मार झेल रहा है। यह गीत शोषकों पर व्यंग्य भी है, किन्तु अन्तिम पंक्तियाँ जिस विराट बिम्ब का सृजन करती हैं- सोचने पर विवश कर दिया- 

कभी कोयले-सा धधका 
फिर राख बना, रोया 
माटी में मिल गया 
कि जैसे 
माटी में सोया 

चलता है हल 
गुड़ता जाए 
टुकड़ा कागज़ का। 

साधरण चीजों में दैवीय और महनीय गुणों को देखने की दृष्टि ने मुझे चैंका दिया। कवि की आंतरिक तबियत को जानने की उत्कंठा से मैं कृति को आद्योपांत पढ़ गया। विस्मय की बात यह रही कि पाठ के दौरान महाप्राण निराला कहीं-कहीं ताल देते जा रहे थे। शब्दस्फुरण में महान आदर्शों का स्मरण कराने की शक्ति होती है। निराला जी लघु में विराट को देखने के लिए लघुतर होते जाने की जिस साधना पर जोर देते हैं, वो वास्तव में शक्ति की साधना ही है। निराला जी कहते हैंतुम अपने में सूक्ष्म (लघु) को देखने की शक्ति का संचार करो। जिस प्रकार आँखों के तिल में पूरा आकाश समा जाता है, गागर में सागर समा जाता है- 

आँखों के तिल में दिखा गगन 
वैसे कुल समा रहा है मन 
तू छोटा बन, बस छोटा बन 
गागर में आएगा सागर। (आराधना से) 

निराला की तमाम रचनाओं में लघु का विराटीकरण पूरे परिदृश्य के साथ उपस्थित हुआ है, लेकिन दूसरी तरफ शोषक और शोषित का वर्तमानीकरण भी हुआ। ‘राम की शक्ति पूजा’ और ‘कुकुरमुत्ता’ सर्वोत्तम उदाहरण हैं। निराला छोटे आदमी को वहिर्जगत के द्वन्दों में नहीं झोंकना चाहते। वहाँ तो वह सामंतों-शोषकों से मात खा ही रहा है। उस पूरी व्यवस्था के विकल्प में उनका मानना है कि लघु और विराट के द्वन्द्वात्मक संबन्ध् की ऊर्जा को यदि छोटा आदमी अपने भीतर संजोएगा तो एक दिन वह शक्तिशाली हो उठेगा। आणुविक थ्योरी के अनुसार लघु संपूर्ण (विराट) का एक घटक ही है। जैसे ब्रह्माण्ड के घटक हैं, ग्रह-नक्षत्र आदि। ‘तू छोटा बन, बस छोटा बन’, अर्थात् लघु से लघुतर होते जाना एक व्यंजनात्मक संकेत है, उसी आणुविक थ्योरी की ओर। लघुकण का सबसे सूक्ष्मकण ‘परमाणु’ होता है, जिसके बनते ही वह परमशक्तिशाली हो उठता है। 

अवनीश चैहान के सृजन में उपरोक्त तत्वों के संकेत हैं, जहाँ उनकी काल्पनिक, भावुक और नैसर्गिक शक्तियों का, यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में समाजीकरण हुआ है। कहना चाहूँगा कि शक्ति का विलय (‘राम की शक्ति पूजा’ आदि के संदर्भ में) महाशक्ति में होना ही निराला का महाप्राण होना है। यहाँ ‘टुकड़ा कागज़ का’ अन्ततः मिट्टी में गुड़कर महाशक्ति में एक लय हो विलीन हो जाता है। 

इसी प्रकार कवि के कुछ गीतों में ‘दूब’ और ‘तिनका’ जैसी अति सामान्य चीजें असामान्य बनकर विराट बिम्ब का सृजन करती हैं। इन विषयों पर मेरे संज्ञान में आए अब तक के गीतों में ये गीत श्रेष्ठ लगते हैं। ‘एक तिनका हम’ की मानवीयता हमंें झकझोर देती है। ऐसे गीतों में कवि की अनुभूति उसके कष्ट-साध्य संघर्षों से सघन हो गई है। यहाँ भी निरीह और दलित व्यक्ति का प्रतीक है तिनका। इस शब्द की गहनतर अर्थमीमांसा हुई है गीत में, जिसकी सविस्तार व्याख्या अपेक्षित है। अन्तिम पंक्तियों में वह तिनका कह उठता है- 

साध् थी उठ राह से 
हम जुड़ें परिवार से 
आज रोटी सेंक श्रम की 
जिंदगी कर दी हवन। 

एक तिनके (निरीह व्यक्ति) का यह उत्सर्ग क्या गीत को कालजयी नहीं बनाएगा? गज़ब का गीत है, गज़ब की कविता है यह। 

आज हमारे सामने जिजीविषा की जो वैश्विक चुनौतियाँ हैं। हमारे समाज की और समाज के निचले से निचले स्तर की समस्याओं के जो प्रतिरोध् हैं और उनके जो भविष्य-बोध् हैं उस पूरे लोक पर अवनीश की दृष्टि है। यहाँ इस पुस्तक द्वारा उठाए गए सभी पक्षों पर बात संभव नहीं, पर हाँ, इस कृति के लिए जो ज्यादा जरूरी है, उस पर अपनी राय अवश्य रखने का प्रयत्न कर रहा हूँ। 

कवि के गीतों में आधुनिकता-बोध् की प्रखरता है। यह दूसरी बड़ी विशेषता है। आधुनिकता को स्थापित करने में सबसे पहले युवा वर्ग ही आगे आता है जो स्वाभाविक ही है। नवगीत पर विचार करने से पहले हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सही मायने में नवगीत एक आधुनिक अवधरणा है, जिसकी जड़ें हमें नवजागरणकाल से जोड़ती हैं। जहाँ हमारी वस्तुपरकता और तथ्यपरकता में तीव्रता आती है और हम पहले से ज्यादा विज्ञान सापेक्ष और समय सापेक्ष होते चले जाते हैं। नव-जागरणकाल की अवधरणा के साथ साहित्य का भी मुख्य तत्व था स्वातंत्रयबोध्, जिससे हमारे जीवन के सभी सरोकार प्रभावित होते गए। हिन्दी साहित्य में नवजागरणकाल से प्रभावित होने वाले पहले कवि हैं महाप्राण निराला। इसलिए मैं निराला को पहला क्रान्तिकारी आधुनिक कवि मानता हूँ। 

दुर्भाग्य से हमारे देश में ‘आधुनिकता’ शब्द यूरोप के ‘मॉडर्निटी’ शब्द का पूरी तरह से पर्याय नहीं बन पाया। उत्तर आधुनिकतावाद भी नहीं। वह मूल्यों को और भी विक्रत कर रहा है, समाज में और साहित्य में भी। यह संग्रह हमें आधुनिकता का प्रमुखता से दो रूपों में अवलोकन कराता है- आधुनिकता का एक अर्थ है जो हमें स्वतंत्रता, संयम, वैज्ञानिकता, तार्किकता, भविष्यधर्मिता और संलक्ष्यता आदि का बोध् कराता है। दूसरी तरफ वह फैशन तथा फैशन के रूप में ओढ़ी हुई अंग्रेजियत, अपसांस्कृतिकता, अनैतिकता और अंधविश्वास आदि को अर्थ देता है। यह दूसरे प्रकार का जो आधुनिकताबोध् है वही हमारे समाज को और हमारी बाल और युवा पीढ़ी को उच्श्रृंखल और मिथ्याचारी बना रहा है अर्थात् आधुनिकता शब्द की सही व्यंजना और सही हनक-धमक को खण्डित कर रहा है। टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलने से, जीन्स शर्ट-टाई पहनने से और पिता की कमाई को क्लबों- होटलों में बहाने से कोई मॉडर्न नहीं बन जाता। गैरिक वस्त्र धरण कर और सन्यासी होकर भी विवेकानंद मॉडर्न थे। धर्म के पृष्ठाधर पर आधुनिकता के प्रथम उद्घोषक हुए हैं विवेकानंद और उसके बाद 20 वीं शती में ओशो एवं प्रभात रंजन सरकार। 

अवनीश के अधिकांश गीतों में उपरोक्त परिदृश्य का कथ्य अभिव्यक्त हुआ है। हर युग के अपने-अपने पाखंड और अंधविश्वास हो जाते हैं। सनातन मूल्य युग की गर्द से जो थोड़े धूमिल दिखाई देने लगते हैं, उस गर्द को झाड़ना ही आधुनिक होना है। कबीर अपने समय के सबसे बड़े आधुनिक हुए। मानवतावादी हुए। उनके युग में छुआछूत और मूर्तिपूजा का बोलबाला था। उन्होंने एक दोहा प्रचारित कर उस कुलीनवादी परम्परा को चुनौती दे दी जो हज़ारों वर्षों से आरूढ़ थी। आधुनिकता (ज्ञान-विज्ञान) की एक चिंगारी ने अंधविश्वास पर चोट ही नहीं की, साधरणजनों का हृदय परिर्विर्तत कर दिया और अस्पृश्यों के लिए ज्ञान मार्ग का द्वार खोल दिया- 

पाहन पूजैं हरि मिलैं तो मैं पूजूँ पहार 
वा ते वो चाकी भली, पीस खाय संसार। 

अवनीश भी फैशनपरस्ती पर चोट कर रहे हैं, लेकिन अपनी नई शैली में। आज फैशन और मिथ्याचरण ने हमको हमारे निष्ठ-नैसर्गिक और स्वाभाविक जीवन से अलग-थलग कर दिया है। पशु-पक्षी भी हमारे रूखे व्यवहार से हतप्रभ हैं। गर्भवती गौरैया घोंसला बुनने की उचित जगह न मिलने पर गर्भपात जैसी दर्दनाक समस्या से जूझ रही है। मोबाइल-लैपटॉप स्टेटस ने घर-परिवार की रागात्मकता को सोख लिया है। कामुक पॉप-धुनों और कैटवाक की अधीन सभ्यता छद्म सम्मोहन और वाक् चातुर्य वशीभूत युवा पीढ़ी अपनी ज़मीनी सात्विकता से विमुख हो भटक रही है। विद्यार्थी-गण कॉलेज में जोड़-तोड़ से उत्तीर्ण हो भी गए तो प्रतिस्पर्ध में निराश-निरूपाय हो अपराधवृत्ति का विकल्प चुन रहे हैं। किशोरावस्था में ही दैहिक वर्जनाएँ टूट रही हैं। फैशन के रूप में टेलिविजनी आधुनिकता ने बच्चों पर बुरा असर डाला है। माँ हैरान है- 

टॉफी, बिस्कुट, पर्क, बबलगम 
खिला-खिला कर मारी भूख 
माँ भी समझ नहीं पाती है 
कहाँ हो रही भारी चूक 

माँ का नेह मनाए हठ को 
लिए कौर में रोटी-साग। 

रचनाकार अपने तमाम गीतों में कथित फैशनपरस्ती के बरक्स व्यक्ति में कर्तव्यबोध् को जगाने का प्रयत्न करता दिखाई देता है। ‘बदला अपना लाल’ में ‘समय सुई है’ का सांकेतिक प्रयोग और मिथक के रूप में ‘कबीर’ दोनों मिलकर लक्ष्यार्थ का बोध् कराते हैं- 

तकली में अब लगी रुई है 
कात रहा है, समय सुई है 
कबिरा-सा बुनकर बनने में 
लगते कितने साल? 

कथित फैशन अब नहीं चलने वाला। यह कवि का आत्मविश्वास है। क्योंकि- ‘लाख-भवन के आर्कषण में/ आखिर लगती आग।’ इस तरह संग्रह के अनेक गीतों में कवि का मनोभाव और विवेक संवादरत है, जैसे ‘मन का तोता’, ‘रस कितना’ और ‘साधे मन को’ आदि गीतों में भावना और बुद्धि का सोद्देश्यात्मक समंजन हुआ है। 

रचनाकार की कुछ रचनाएँ हमें उस गहरे बोध् से जोड़ती हैं, जहाँ आधुनिकता अपने वैभव में अहममन्य हो गई है। गौर करें, हिन्दी साहित्य के जितने भी काल खंड- प्रयोगशीलता, प्रगतिशीलता, समकालीनता एवं उत्तरआधुनिकता आदि, आधुनिकता के घटक ही तो हैं। ये सभी घटक उसी-नवजागरण काल से नालबद्ध हैं। किन्तु जरा विचारिये- भूमंडलीकरण आया तो वह उपरोक्त सभी वैचारिक अवधरणाओं को नेस्तनाबूद करने के लिए आया, यानी पूरे साहित्य को खत्म करने के लिए आया। भूमंडलीकरण भी आधुनिकता की ही अवधरणा है। ऐसा आधुनिकतावाद जिसमें पूँजीवाद का वैज्ञानिकीकरण हुआ है। बाज़ार जिसकी आत्मा है और विज्ञापन छोटा भाई। कवि की दृष्टि भूमंडलीकरण के एक-एक अंग पर गई है। उसने हर एक दृश्य का अंतर्मंथन किया है- ‘विज्ञापन की चकाचैंध्, ‘बाज़ार समंदर’, ‘पंच गाँव का’ और ‘उसका खाता’ आदि सृजित वस्तुस्थितियों पर तनिक विचार करें। क्या हमारे देश की आधुनिकता का एक विद्रूप भाग बनकर नहीं रह गया है भूमंडलीकरण? जरा इसकी दबंगई देखिए- 

हमें न मँहगाई की चिन्ता 
नहीं कि तुम हो भूखे-प्यासे 
तुमको मतलब है चीजों से 
हमको मतलब है पैसा से 

तुम पूरा बाज़ार उठा लो 
उबर न पाओ खर्चों से 

सभ्यता तो वर्तमान होती है। संस्कृति उसके सकारात्मक अंशों को स्वीकार कर खुद को परिवर्तित और समृद्ध करती है। यह सिद्धान्त भूमंडलीय औपनिवेशिकता के प्रभाव और दबाव में लगभग टूट चुका है, क्योंकि औपनिवेशिक सभ्यता ने तरह-तरह के कीर्तिमानी प्रलोभनों का जाल फैला दिया है हमारे समाज पर। विश्व के शिखर पर पहुँचने की प्रतियोगिताएँ, देशी ठसक और धमक को घृणा में बदल रहीं हैं। एक गणना के अनुसार पचास प्रतिशत युवा प्रतियोगियों को इस कथित रेस से बाहर कर तनावयुक्त और बीमार कर दिया गया। कई तो आत्महत्या के शिकार भी हुए। इसलिए मेरा समझना है कि वैचारिक स्तर पर हम न गाँधीवादी रहे और न मार्क्सवादी। ऐसे में उत्तर आधुनिकतावाद में बराबरी और सामाजिकता ढूँढना कहाँ की समझदारी है? वहाँ का पूँजीवाद एक व्यक्तिवादी अवधरणा ही नहीं बल्कि व्यक्तिवाद को भी व्यक्तिगत बनाते हुए, उससे काम निकालने की एक शैली बन गया है। अर्थ-शक्ति की हवश ही पूंजीवाद का असलीरूप है। अवनीश के गीतों में उपरोक्त ध्वनित होता है। 

ये गीत बोध् कराते हैं कि भूमंडली-तंत्र कैसे-कैसे सूक्ष्म रूपों में हमारे भीतर प्रवेश कर रहा है। यानी हमारी कार्यशैली को हमारे विरुद्ध करके हमारी ही थाती का अवमूल्यन रचा जा रहा है। गाँवों-शहरों में एक अदृश्य कुंठाभाव कहीं घर कर रहा है। गाँव और शहर आमने-सामने होकर खण्डित मानसिकता जी रहे हैं। एक गीत है- ‘गली की धूल’, विसंगति का मार्मिक चित्र। कवि की मनोदशा अचरज में डाल देती है। गाँव से पलायन होकर शहर में आए व्यक्ति ने क्या पाया और क्या गँवाया, का विश्लेषण आसान नहीं है। गीत की अंतर्वीथियाँ हमें दूर-दूर तक ले जाती हैं। पूरा गीत उद्धृत करने योग्य है, यहाँ अन्तिम पंक्तियाँ- 

बुढ़ाए दिन, लगे साँसें गवाने में 
शहर से हम भिड़े सर्विस बचाने में 
कहाँ बदलाव ले आया 
शहर है या कि है अजगर? 

संग्रह के भीतरी अवलोकनों के बीच-बीच में एक पाठक की उत्कंठा यह जानने की अवश्य रहती है कि यह कवि अपने संग्रह के बाहर कैसा होगा। मेरा मानना है कि समाज का आदर्श वही कवि बनता है जिसका व्यक्तित्व और कृतित्व पारदर्शी हो। व्यक्ति के अंतर्वाह्य जगत को उसकी प्रतिभा ही संतुलित करती है। कहा जाता है कि प्रतिभा व्यक्ति में जन्म के साथ आती है। और परिवेश संस्कारी हो तो साधनाएँ बचपन से ही शुरू हो जाती हैं। सन् 1893 में शिकागो (अमेरिका) में युवा विवेकानंद ने उद्भुत भाषण देकर विश्व में हिन्दुत्व का परचम लहरा दिया था। उन्तीस वर्षीय पी॰बी॰ शैली ने अज्ञात लेखक के रूप में ईश्वर के विरुद्ध हो जाने को आवश्यक मानते हुए एक किताब लिखी और छपवा डाली। महत्वपूर्ण प्रसंग यह है कि उस कृति की ख्याति ने उन्हें ऑक्सफोर्ड से निष्कासित करवा दिया। 15 वर्षीय नेपाली अपने पहले ही कवि सम्मेलन से विख्यात हो गये थे। मंच पर उपस्थित कथा-सम्राट प्रेमचंद्र ने कहा था- ‘बरखुरदार, कविता क्या पेट से सीखकर आए हो।’ यह सब प्रतिभा के ‘चरैवेति’ प्रभाव के अंतर्गत है। जैसे जल-समूह की गत्यात्मक शक्ति धरा फोड़ लेती है, वैसे ही प्रतिभा मील-स्तम्भ बनाती जाती है और आगे चलती चली जाती है। एक और सूत्र कथन याद आ रहा है। डॉ शन्तिसुमन के गीतों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कभी डॉ विजेन्द्र नारायण सिंह ने कहा था- ‘प्रतिभा की एक पहचान यह है कि वह विकसनशील होती है।’ हमारे प्रिय अवनीश ऐसे ही प्रतिभाशाली कवि-लेखक हैं। एम॰ फिल॰ (अंग्रेज़ी) करते ही मात्र 24 साल की उम्र में एक अंग्रेज़ी किताब (स्वामी विवेकानंद: सिलेक्ट स्पीचेज) लिख डाली, जो परास्नातक पाठ्यक्रम में कई विश्वविद्यालयों में पढ़ी-पढ़ाई गयी। एक विश्वविद्यालय में कार्यरत् अंग्रेजी- प्राध्यापक अवनीश चैहान हिन्दी के क्षेत्र में आए तो मात्र 6-7 साल की अवधि में ही जो भी गद्य-गीत लेखन और संपादन कार्य किया, वह सराहा गया। आजकल वे अनेक छोटी-बड़ी पत्र-पत्रिकाओं में छप रहे हैं। गत 2-3 वर्षों में इण्टरनेट पर ‘पूर्वाभास’ जैसी पत्रिका निकालकर उन्होंने विशेष ख्याति अर्जित की है। हर्ष का विषय ही है कि इस कवि की कार्यशैली विश्वस्तर पर भी सम्मानित/ पुरस्कृत हो चुकी है। साहित्यिक दौड़ में  अभी तो इस धवक ने दशक भी पार नहीं किया किन्तु उसकी कविता का यह वामन रूप मेरे जैसे उम्रदराजों को चकित कर देने के लिए काफी है। इस अवांतर प्रसंग के बाद हम पुनः संग्रह के भीतरी लोक में लौटते हैं। 

संग्रह में कतिपय प्रेम-गीत और नदी-गीत भी समायोजित किए गए हैं। नवगीत के कुछ घिसे-पिटे प्रतीक शब्दों में ‘नदी’ भी एक है। नवगीतकारों ने नदी का मानवीकरण किया है। नदी-गीतों में डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया का गीत सर्वश्रेष्ठ माना गया है- ‘नदी का बहना मुझमें हो’- मेरा स्वभाव नदी जैसा हो जाए। यह स्व से सर्व होना है, सर्ग से निसर्ग होना। व्यक्ति का नदी के रूप में अवतरण अर्थात् बंजर-भूमि, घड़ियाल और गागर आदि सबके लिए समानधर्मा हो जाना है। यही रचनाकार की आंतरिक क्रान्ति है। यह सचेतन जीवन-साधना-सिद्धि है, साधुता है। अवनीश कहते हैं- ‘पंख सभी के छुएँ शिखर को/ प्रभु दे, वह परवाश।’ कवि के नदी-गीत अत्यंत सामाजिक हैं। उसके गीत भी ‘मैं’ शैली में हैं। युगीन विदू्रपताओं से अतिक्रान्त हो, वह भी स्व से सर्व हुआ है। युगीन शोषण से नदी भी नहीं बच पाई। वह प्रदूषित तो हुई ही, सूख भी गई है। कवि स्वयं गल-गल कर नदी की धर बनना चाहता है। एक-दूसरे गीत में कवि को नदी के रूप में सागर (अन्तिम सत्य) को वरण करना है। तो जरूरी है वह तप जो सारे पूर्वाग्रहों से मुक्त करा दे। बड़ी बात है। साहित्य के लिए और मोक्ष के लिए भी। मैंने देखा है कवि को। आचरण में भोले और साधना  में नीलकंठी। द्रवणशीलता उसके संस्कारी गुणों में शामिल है। यदि ऐसा न होता तो ये पंक्तियाँ जेहन में कैसे आ पाती- 

नाव चले तो मुझ पर ऐसी 
दोनों तीर मिलाए 
जहाँ-जहाँ पर रेत अड़ी है 
मेरी धार बहाए 
ऊसर-बंजर तक जा-जाकर 
चरण पखार गहूँ मैं। 

या 

वरण करेंगी कभी सिन्धु का 
पूर्वाग्रह सब तोड़ के। 

प्रेम-गीतों को पढ़ लेने के बाद मुझको यह आभास हुआ कि कवि ने बुहत से प्रेम-गीत लिखे होंगे, उनमें से ये पाँच गीत चयनित किए हैं। ऐसा शायद इसलिए हुआ होगा, कि प्रेम-बिम्ब को साधने में प्रायः भंगिमाओं-संवेगों की फिसलन अधिक हुआ करती है, जिससे रचना में हृदय और बुद्धि का संतुलन डगमगा जाया करता है। ऐसा लगता है कि अवनीश ने इस संग्रह में अपनी रचनात्मकता का सर्वोत्तम परोसा है। इन गीतों में उनके कौशल्य और प्रावीण्य का पूरा योग है। 

एक रचनाकार अपने भावात्मक, कल्पनात्मक, दृश्यात्मक और ज्ञानात्मक अभिगमों के द्वारा अपनी मूल कथ्यवस्तु को प्रभामंडित करने में जिस भाषा को मेरुदण्ड बनाना चाहता है, उसकी संतुष्टि से ही एक रचना होती है- एक गीत होता है। भाषा ही वह ‘रेसिपी’ है जहाँ अर्थों-भावों के सारे रस अपने में विलीन कर अस्वादन को अद्वितीय बना देती है जैसे मधुमक्खी विभिन्न प्रकार के पुष्प-रसों को मधु में रूपान्तरित कर देती है। गीत के सन्दर्भ में प्रेम की विविध् परिभाषाएँ हैं। उन सभी को जेहन में रखते हुए मैं कहना चाहूँगा कि प्रेम और ईश्वर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों का केन्द्र है गीत-सृष्टि। डॉ सुरेश गौतम का सूत्र कथन है- ‘गीत (प्रेम) अध्यात्म है, तपश्चर्या है। गीत नीलकंठी द्रव है’। 

दुनिया में दो ही अस्तित्व ऐसे हैं जिनका साहित्य सर्वोपरि है। एक है ईश्वर और दूसरा प्रेम। दोनों अव्यक्त हैं। दोनों का साहित्य आज तक पूर्णता को प्राप्त नहीं हो सका। दोनों ‘शायद’ पर अवलम्बित हैं। प्रेम में गहरे डूबे हुए किसी प्रेमी से पूछो- ‘आप ने प्रेम को जान लिया? उसका उत्तर होगा- ‘शायद’। स्यात्वाद के प्रवर्तक भगवान बुद्ध से पूछा गया- ‘क्या ईश्वर है?’ उनका उत्तर था- ‘शायद’। अवनीश के पाँच प्रेम-गीतों का संचारी भाव प्रकृत है, तथापि ये गीत श्रेष्ठ हैं। कई गहनतम हैं, जहाँ दृश्य और द्रष्टा अभेद्य हो जाते हैं। शायद प्रेम की गहनतम अनुभूति का रस उन्होंने चख लिया है। ‘एक आदिम नाच’ का तो यही संकेत है- 

एक स्मित रेख तेरी 
आ बसी जब से दृगों में 
हर दिशा तू ही दिखे है 
बाग़-वृक्षों में, खगों में 

दर्पणों के सामने जो बिम्ब हूँ 
वो मैं नहीं- कादम्बरी तू! 

मेरी राय में ऐसे गीत व्याख्यातीत होते हैं। यहाँ यह भी स्मरण में रखना होगा कि कवि अपने गीतों में जिस विराट-बिम्ब और मानवीय चेतना की बात उठाता है उन सब का मूलाधर उसकी प्रेम-शक्ति ही है। 

कृति के अवगाहन में विविध् कथ्यालोकों ने मुझे अप्रत्याशित रूप से प्रभावित किया है। उन सबों पर बात होनी चाहिए। पर यह सब एक भूमिका लेख में संभव नहीं। विस्तार पर अकुंश और ज्वलंत समस्याओं को केन्द्र में रखने के उपरांत अनेक महत्वपूर्ण गीत छूट रहे हैं। गीत जो ऋतुओं, त्योहारों और रिश्तों की रागात्मक और आत्मीय ऊष्मा-ऊर्जा से आप्लावित हैं, सभी नवोन्मेषी हैं। सभी गीतों में अद्भुत विम्बधर्मिता है। ‘पत्थर-सी रोटी’, ‘समय सुई है’, ‘बाज़ार-समंदर’, ‘सपनों की पैंजनिया’, ‘सूरज एक चुकन्दर’, ‘छल की गाँठ’, ‘सुहागिन का टोना’, ‘पोटली का मोती’, ‘खुशियों की क्रीम’ और ‘दुःखों का दही विलोना’ जैसे प्रयोगों की द्युति इन गीतों की प्राणशक्ति बन गई है। 

आज वैश्विक पटल पर बड़े सर्जकों की जो चिंताएँ हैं उनसे अलग नहीं हैं चिताएँ जो इन गीतों में उठाई गई हैं। इसके बावजूद शिल्प-शैली में सबसे अलग होकर स्वनिर्मित मार्ग पर चला है कवि। कॉमन लय और कॉमन कथ्य से समझौता न करते हुए मौलिक और परिपक्व दृष्टि के परिचायक हैं ये गीत। लोक तथा जन और प्रगतिशील भाषा का समन्वय भाव है कवि का भाषा-मुहावरा। उसका प्रयत्न श्लाघनीय है। यह प्रयत्न सायास न होकर अनायास ही है, जैसे अनायास होती है बच्चों की सोच। उनकी सोच में संसार अपेक्षाकृत सहायक नहीं बन पाता। बाल्यावस्था संसारिकता से अनभिज्ञ होती है। साहित्य के क्षेत्रा में एक युवा रचनाकार की यही स्थिति होती है। हालांकि संग्रहीत गीत, कवि की अध्ययनशीलता एवं चिन्तन-मनन के द्योतक हैं। परिवेश को उसने भी खुली आँखों से देखा, भुगता है। पर इनमें साहित्य का छाद्मिक चातुर्य नहीं, निर्दोष मन की झलक है। यही झलक पाठकों की दिलचस्पी बनेगी। वैसी ही दिलचस्पी जैसे कभी गाते हुए ‘सॉलिटरी रीपर’ को सुनने के लिए ठिठक कर खड़े हो गये थे कवि विलियम वर्ड्सवर्थ। 

एक बात और कहना चाहूँगा कि गीत रचना शब्दों की मितव्ययी होती है। अवनीश चैहान के गीत इस तथ्य के प्रमाण हैं। आकार-प्रकार में छोटे-छोटे अर्थ गुंजलक हैं ये। संख्या भी बहुत कम, मात्रा 44 तक ही पहुँच पाती है। आपको ये सारे अर्थ-गुंजलक लघुता में विराटता का बोध् कराने वाले लगेंगे। वस्तु यदि सघन होकर केन्द्रित होगी तो उसकी अर्थ-वीथियाँ हमें दूर-सुदूर तक ले जाएंगी। निम्न उदाहरण से उक्त कथन ज्यादा स्पष्ट होगा- ‘ग़रीबी में जुड़े थे सब / तरक्की ने किया बेघर।’ 

आज तेजी से दुनिया बदल रही है। शब्द संकट भी गहरा रहा है। चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। सभी का विकल्प एक ही है। नई-नई सर्जना हो, उसकी स्थापना हो। आलेख की शुरुआत में डॉ विमल की नई स्थापनाओं का उल्लेख हुआ है। वैसा साहस हमारा समस्त बुद्धिजीवी समाज दिखा सके तभी ‘टुकड़ा कागज़ का’ जैसी समर्थ कृतियों की वास्तविक सार्थकता सिद्ध हो सकेगी। 

मेरा मानना है कि साहित्य में भावुक सत्य ही साहित्य की मौलिक उद्भावना होती है। मेरा यह भी मानना है कि किसी युवा मन का प्रारम्भिक शब्द-श्रम और तपश्चरण उसके भावोत्कर्ष की परिणति होती है। अतः ऐसे शब्द-साधक को अग्रजों-आचार्यों का वरदीय नेहाशीष मिलना ही चाहिए। विश्वास है कि ‘टुकड़ा कागज़ का’ का प्रकाशन हिन्दी साहित्य के क्षितिज पर अपनी सूर्योदयी भूमिका निभाएगा। बस इतना ही। 



वीरेन्द्र आस्तिक 
एल-60, गंगा बिहार 
कानपुर-208010 




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नवगीत संग्रह ''टुकड़ा कागज का" को अभिव्यक्ति विश्वम का नवांकुर पुरस्कार 15 नवम्बर 2014 को लखनऊ, उ प्र में प्रदान किया जायेगा। यह पुरस्कार प्रतिवर्ष उस रचनाकार के पहले नवगीत-संग्रह की पांडुलिपि को दिया जा रहा है जिसने अनुभूति और नवगीत की पाठशाला से जुड़कर नवगीत के अंतरराष्ट्रीय विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। सुधी पाठकों/विद्वानों का हृदय से आभार।