Monday, 14 October 2013

अपना गाँव-समाज - अवनीश सिंह चौहान

बड़े चाव से
बतियाता था
अपना गाँव-समाज
छोड़ दिया है
चैपालों ने
मिलना-जुलना आज

बीन-बान लाता था
लकड़ी
अपना दाऊ बाग़ों से 
धर अलाव
भर देता था, फिर 
बच्चों को अनुरागों से

छोट-बड़ों से
गपियाते थे
आँखिन भरे लिहाज

नैहर से जब आते
मामा
दौड़े-दौड़ै सब आते
फूले नहीं समाते
मिलकर
घंटों-घंटों बतियाते 
भेंटें  होतीं-
हँसना होता
खुलते थे कुछ राज

जब जाता था
घर से कोई
पीछे-पीछे पग चलते
गाँव किनारे तक
आकर सब
अपनी नम आँखें मलते

तोड़ दिया है किसने 
आपसदारी का
वह साज



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