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Sunday, 13 October 2013

प्रसंगवश - अवनीश सिंह चैहान

हिन्दी गीत-नवगीत के प्रमुख हस्ताक्षर श्रद्धेय दिनेश सिंह जी जब ‘नये-पुराने’ का जगदीश पीयूष जी की रचनाधर्मिता पर केन्द्रित अंक निकालने की तैयारी कर रहे थे, इसी दौरान मेरी उनसे भैंट हुई। बातचीत के दौरान उन्होंने पूछा कि क्या तुम हिंदी में भी लिखते हो? मैंने ‘न’ कहा और बताया कि अंग्रेजी का विद्यार्थी होने के कारण मेरा पठन-पाठन एवं लेखन अंग्रेजी में हो रहा है। तब उन्होंने कहा कि तुम्हें हिन्दी में भी लिखना चाहिए।मैंने कहा कि मुझे लिखना नहीं आता। कहने लगे कि बोलना तो आता है तुम्हें, बस इसी को लिख दो। मैं हँस पड़ा। उन्होंने पीयूष जी की एक कृति मुझे देते हुए कहा कि इस पर कुछ लिखकर लाना, बाकी मैं देख लूँगा। एक-डेढ़ सप्ताह बाद मैं सोलह पृष्ठों का एक समीक्षात्मक आलेख लिखकर ले गया, जो उन्हें बहुत पसंद आया। फ़िर क्या था, हमारे बीच साहित्यिक चर्चाएँ भी अक्सर होने लगीं और आपसी स्नेह एवं सम्पर्क, दोनों साथ-साथ बढ़ते गए। इस तरह मैं उनका आत्मीय हो गया। 

समय बीता उन्होंने ‘नये-पुराने’ का ‘कैलाश गौतम स्मृति अंक’ तैयार करने की ज़िम्मेदारी मुझे सौंप दी। यह बड़ा कार्य था, जबकि मेरा अनुभव बहुत ही कम; किन्तु उनके कुशल निर्देशन में उस अंक की सामग्री संपादित की। जब पाठकों-विद्वानों के हाथों में अंक पहुँचा तो उनकी सकारात्मक प्रतिक्रियाओं से मेरे भीतर हिन्दी लेखन के प्रति रुचि एवं आत्मविश्वास जगा। इस अंक के तैयार होने के पश्चात दिनेश सिंह जी का स्वास्थ्य और अधिक ख़राब हुआ और दुर्भाग्य से उनकी बोलने की शक्ति भी चली गई। मेरा उनसे संवाद टूटने लगा था- कहूँ तो एकतरफा हो गया, जो कहना-सुनना होता था, मैं ही उनसे कह-सुन लेता था। वे तो बस ‘हाँ-हूँ’ ही कर पाते। और एक दिन यह संवाद भी हमेशा-हमेशा के लिए बंद हो गया। यहाँ मैं उनकी स्नेहिल स्मृतियों को नमन करता हूँ। 

जब भी कलम उठाता हूँ, मुझे याद आती हैं डॉ वेदप्रकाश ‘अमिताभ’ जी की ये पंक्तियाँ- ‘व्यर्थ है कागज़ रंगना। जब अपना लिखा खुद में ही हिम्मत नहीं जुटा पाता, लिखने का क्या फ़ायदा?’ किंतु, तभी उनकी दूसरी बात मुझे हौसला देती है कि यदि विकृतियों-विडंबनाओं के विरुद्ध कुछ कहना चाहते हो, ‘तो पहले कागज़ पर ही प्रतिवाद करो।’ शायद इसीलिए मैंने कलम चलायी। परिणामस्वरूप यह ‘टुकड़ा कागज़ का’ शीर्षक से मेरा प्रथम गीत-संग्रह आपके समक्ष प्रस्तुत है। 

इस कृति के सदंर्भ में अपने अमूल्य अभिमत प्रदान करने वाले हिन्दी साहित्य के वरिष्ठ हस्ताक्षर परम श्रद्धेय डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया, वीरेन्द्र ‘आस्तिक’ जी, गुलाब सिंह जी, शचीन्द्र भटनागर जी, डॉ विमल जी, डॉ  बुद्धिनाथ मिश्र जी, प्रो॰ अनिल जनविजय जी, डॉ महेश ‘दिवाकर’, माहेश्वर तिवारी जी एवं मधुकर अष्ठाना जी के प्रति मैं कृतज्ञ हूँ, श्रद्धानवत हूँ। साथ ही, इस कृति के अक्षर संयोजन हेतु मैं अपने प्रिय मित्र पंकज चैहान, आवरण पृष्ठ हेतु पूर्णिमा वर्मन जी एवं प्रकाशन सहयोग हेतु अखिल भारतीय साहित्य कला मंच का आभार व्यक्त करता हूँ। 

साथ ही, मैं प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं के विशिष्ट सम्पादकों सहित अपने गुरुजनों, अग्रजों, सम्बन्धियों, मित्रों, सहयात्रियों एवं सुधी पाठकों, जिन्होंने समय-समय पर मेरे अनुजत्व को मनोबल प्रदान किया, का हृदय से अभिनन्दन करता हूँ। 

पूजनीय माता-पिता के आशीर्वाद तथा प्रिय अनुज शिवम् सिंह एवं अनुजाओं- प्रिंयका व दीपिका की शुभकामनाओं के फलितार्थ मेरी रचनाओं को पुस्तकाकार मिल सका है। मैं अपने बहनोई प्रिय गौरव सिंह का भी आभारी हूँ। मेरी सहधर्मिणी नीरज सिंह का हर पल प्रत्यक्ष-परोक्ष सहयोग इस कृति के प्रकाशन में महत्त्वपूर्ण कारक रहा है। साथ ही दोनों पुत्र- ओम एवं सोम की शरारतों ने भी मेरे रचनाकार को समय-समय पर ऑक्सीजन दी है। 

पुनश्च, कहीं पर पढ़ा था कि ‘साधरण चीज़ों के पीछे असाधरण कहानी होती है।’ शायद इन्हीं साधरण-सी लगने वाली चीज़ों से कुछ महत्वपूर्ण बातों-विचारों को समेटकर-संश्लेषितकर मैंने उन्हें शब्द देने का प्रयास किया है। गीत की शक्ति एवं सार्थकता में विश्वास रखने वाले शब्द-साधक निर्णय कर सकेंगे कि इन्हें गीत संग्रह के रूप में प्रकाशित करने का क्या औचित्य है? मुझे प्रतीक्षा रहेगी आप सब की प्रतिक्रियाओं की। 

नवगीत संग्रह ''टुकड़ा कागज का" को अभिव्यक्ति विश्वम का नवांकुर पुरस्कार 15 नवम्बर 2014 को लखनऊ, उ प्र में प्रदान किया जायेगा। यह पुरस्कार प्रतिवर्ष उस रचनाकार के पहले नवगीत-संग्रह की पांडुलिपि को दिया जा रहा है जिसने अनुभूति और नवगीत की पाठशाला से जुड़कर नवगीत के अंतरराष्ट्रीय विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। सुधी पाठकों/विद्वानों का हृदय से आभार।