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Tuesday, 15 October 2013

ऐसा वर दे! - अवनीश सिंह चौहान

मेरी जड़-अनगढ़ वाणी को 
हे स्वरदेवी, अपना स्वर दे!

भीतर-बाहर 
घना अँधेरा
दूर-दूर तक नहीं सबेरा 
दिशाहीन है मेरा जीवन 
ममतामयी, उजाला भर दे!

मानवता की पढूँ ऋचाएँ 
तभी रचूँ नूतन कविताएँ 
एकनिष्ठ मन रहे सदा माँ,
आशीषों का कर सिर धर दे!

अपने को पहचानें-जानें 
'सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌' मानें
जागृत हो मम प्रज्ञा पावन 
हंसवाहिनी, ऐसा वर दे!

केशव मेरे - अवनीश सिंह चौहान

पाना मुझको
जितना, जो भी
तुमको पाना

सखा सहज तुम
केशव मेरे
हर पल यह मन
तुमको टेरे

लगे अधूरा,
जीवन का
तुम बिन हर गाना

मन की सच्ची
अभिलाषा को
दया-क्षमा की
परिभाषा को

जितना, जो कुछ
जाना-माना
तुमको माना

तुमसे जानी
जगत-कहानी
ज्ञान-ध्यान की
महिमा-वाणी

बना मुझे जिज्ञासु
डगर में
छोड़ न जाना



एक आदिम नाच - अवनीश सिंह चौहान

आज मुझमें
बज रहा
जो तार है -
वो मैं नहीं -
आसावरी तू


एक स्मित
रेख तेरी
आ बसी
जब से दृगों में
हर दिशा
तू ही दिखे है
बाग़-वृक्षों में,
खगों में

दर्पणों के सामने
जो बिम्ब हूँ -
वो मैं नहीं -
कादम्बरी तू

सूर्यमुखभा!
कैथवक्षा!
नाभिगूढ़ा!
कटिकमानी
बींध जाते
हृदय मेरा
मौन इनकी
दग्ध वाणी

नाचता हूँ
एक आदिम 
नाच जो -
वो मैं नहीं-
है बावरी तू



एक तिनका हम - अवनीश सिंह चौहान

एक तिनका हम
हमारा क्या वज़न

हम पराश्रित
वायु के
चंद पल हैं आयु के
एक पल अपना ज़मीं है
दूसरा पल है गगन

ईंट हम
इस नीड़ के
ईंट हम उस नीड़ के
पंछियों से हर दफ़ा
होता गया अपना चयन

ग़ौर से
देखो हमें
रँग वही हम पर जमे
वो हमी थे, जब हरे थे
बीज का हम कवच बन

हम हुए
जो बेदख़ल
घाव से छप्पर विकल
आज भी बरसात में
टपकें हमारे ये नयन

साध थी
उठ राह से
हम जुड़ें परिवार से
आज रोटी सेंक श्रम की
ज़िंदगी कर दी हवन

बिना बताए कहाँ गए - अवनीश सिंह चौहान

टूट गए पर
तुम बिन मेरे
पिंजरे में दिन-रात

रजनीगंधा 
दहे रात भर,
जागे-हँसे चमेली
देह हुई निष्पंद
कि जैसे
सूनी खड़ी हवेली

कौन भरे
मन का खालीपन?
कौन करेगा बात?

कोमल-कोमल
दूब उगी है
तन-मन ओस नहाए
दूर कहीं कोई है वीणा
दीपक राग सुनाए

खद्योतों ने
भरी उड़ानें
जरे कमलनी पात

बिना नीर के
नदिया जैसी, 
चंदा बिना चकोरी
बिना प्राण के लगता जैसे
माटी की हो छोरी

प्राण प्रतिष्ठा हो-
सपनों की
टेर रही सौग़ात



वे ठौर-ठिकाने - अवनीश सिंह चौहान

बीत रहे
दिन और महीने
बीत रहे हैं पल
यादों में 
वे ठौर-ठिकाने
नैनों में मृदुजल

ताल घिरा
पेड़ों से जैसे
घिरे हुए थे बाहों में 
कूज रहे सुग्गे
ज्यों तिरियां
गायें सगुन उछाहों में 

आँचल में
मधुफल टपका है
चूम लिया करतल

शाम, जलाशय
तिरते पंछी
रात पेड़ पर आ बैठे 
चक्कर कई लगाकर
हम तुम
झुरमुट नीचे जा बैठे

पर फड़काकर
पंछी कहते
देर हुई घर चल



नीड़ बुलाए - अवनीश सिंह चौहान

मंगल पाखी
वापस आओ
सूना नीड़ बुलाए

फूली सरसों
खेत हमारे
रंगहीन है
बिना तुम्हारे

छत पर मोर
नाचने आता
सुगना शोर मचाए

आँचल-धानी
तुमको हेरे
रुनझुन पायल
तुमको टेरे

दिन सीपी के
चढ़ आये हैं
मोती हूक उठाए

ताल किनारे
हैं तनहा हम
हंस पूछते
क्यों आँखें नम

द्वार खड़ा जो
पेड़ आम का
बहुत-बहुत कड़ुवाए



अन्तर में जो बन्ना - अवनीश सिंह चौहान

एक प्रवासी
भँवरा है-
रंग-गंध का गाँव है

फूलों को वह भरमाता है
मीठे-मीठे गीत सुनाकर
और हृदय में बस जाता है
मादक-मधु मकरंद चुराकर 

निष्ठुर,
सुधि की धूप बन गया
विरह गीत की छाँव है


बीत रही जो फूलों पर, वह 
देख-देख कलियाँ चौकन्ना 
सहज नहीं है उसका मिलना 
बैठा, अन्तर में जो बन्ना

पता चला
वह बहुत गहन है
उम्र कागज़ी नाव है



रस कितना - अवनीश सिंह चौहान

मेरे मनुआं,
जीवन है तो,
जीवन भर
पड़ता है तपना

जीवन-पंछी
बात न माने
चंचल कितना-
नभ को ताने

इसे सिखा तू
तिरना-उड़ना
पहुँच शिखर पर
सीख ठहरना

नदिया जैसी
चाल निराली
भरी हुई है
या है खाली

कितनी उथली,
कितनी गहरी
तू ही नापे 
तू है नपना

उम्र तँबूरा
तार न बोले
ठीक लगें सुर
तो मुँह खोले

बिन गुरुवर के
जाने कैसे
अन्तर भरा हुआ
रस कितना



मन का तोता - अवनीश सिंह चौहान


मन का तोता
करता रहता
नित्य नए संवाद

महल-मलीदा, पदवी चाहे
लाखों-लाख पगार
काम न धेले भर का करता
सपने आँख हज़ार

इच्छाओं की सूची
मेरे
सिर पर देता लाद

अपने आम बाग़ के मीठे
कुतर-कुतर कर फेंके
किन्तु पड़ोसी का खट्टा भी
चँहके उसको लेके

समझाने पर
करता रहता
अड़ा-खड़ा प्रतिवाद

विज्ञापन की भाषा बोले
‘यह दिल माँगे मोर’
देख-देख बौराए तोता
देता खींस निपोर

बात न माने
करने लगता
घर में रोज़ फ़साद



साधो मन को - अवनीश सिंह चौहान

नये चलन के इस कैफे़ में
शिथिल हुईं सब परम्पराएँ

पियें-पिलाएँ
मौज उड़ाएँ
डाल हाथ में हाथ चले
देह उघारे
करें इशारे 
नैन मिलें औ’ मिलें गले

मदहोशी में इतना बहके
भूल गए हैं सब सीमाएँ

झरी माथ से 
मादक बूँदें
साँसों में कुछ ताप-चढ़ा
हौले-हौले
भीतर-बाहर
कामुकता का चाप चढ़ा

एक दूसरे में जो डूबे
टूट गईं सब मर्यादाएँ

भैया मेरे,
साधो मन को
अजब-ग़ज़ब है यह धरती
थोड़ा पानी
रखो बचाकर
करते क्यों आँखें परती

जब-जब मरा आँख का पानी
आईं हैं तब-तब विपदाएँ



उसका खाता - अवनीश सिंह चौहान

फटे बाँस में
पाँव अड़ाकर
चलता उसका था खाता

भार बना
धरती का घूमे
जैसे कोई था हथियार
इसे डराए, उसे सताए
बनता सबका तारनहार

किससे कितना
लाभ कमाना
उसका इतना था नाता

हुक्का-पानी
बन्द उसी का
जिसने भी ना मानी बात
करे फ़जीहत मग में उसकी
दिखा-दिखा अपनी औक़ात

घड़ा पाप का
भरा हुआ था
फिर क्यों, किसको वह भाता

बाहुबली था
राजनीति में-
पाँव जमाकर छोड़ी छाप
बना सरगना ‘अपने दल’ का
बैर बढ़ाकर अपने आप

राम नाम सत
आया जल्दी
माटी उसका था खाता



क्या कहे सुलेखा - अवनीश सिंह चौहान

किससे अब
क्या कहे सुलेखा

खनन-माफिया
मिलकर लूटे
बाज़, कबूतर
पर ज्यों टूटे

मेट रहे
कुदरत का लेखा

छबिया भोली
धरा-दबोचा
एक व्यवस्था
ने मिल नोचा

पेपर में
दुनिया ने देखा

दुस्साहस
क्रशरों का बढ़ता
चट्टानों से
चूना झड़ता

मिटी हीर की
जीवन-रेखा



पंच गाँव का - अवनीश सिंह चौहान

आँख लाल है
झूम-चाल है
लगते कुछ बेढंगे
इज्ज़त इनसे दूर कि इनकी
जेबों में हैं दंगे

दबंगई की दाढ़ लगी है
कैसी आदमखोरी
सूँघ रहे गश्ती में कुत्ते
लागर की कमजोरी

इनकी चालों में फँस जाते
अच्छे-अच्छे चंगे

गिरवी पर, गोबर्धन का श्रम
है दरियादिल मुखिया
पत्थर-सी रोटी के नीचे
दबी हुई है बिछिया

न्याय स्वयं बिकने आता है
बेदम-से हैं पंगे

पंच गाँव का खुश है लेकिन
हाथ तराजू डोले
लगता जैसे एक अनिर्णय-
की भाषा में बोले

उतर चुका दर्पण का पारा
सम्मुख दिखते नंगे



वक्त की आँधी - अवनीश सिंह चौहान

वक्त की आँधी उड़ाकर
ले गई मेरा सहारा

नम हुई जो आँख,
मन के बादलों का
झुण्ड जैसे
धड़ कहीं है
पर यहाँ तो
फड़फड़ाता मुण्ड जैसे

रो रही सूखी नदी का
अब न कोई है किनारा

पाँव खुद
जंजीर जैसे
और मरुथल-सी डगर है
रिस रही
पीड़ा हृदय की
किन्तु दुनिया बेख़बर है

सब तरफ बैसाखियाँ हैं
कौन दे किसको सहारा

सोच-
मज़हब, जातियों-सी
रह गई है मात्र बँटकर
जी रही है
किस्त में हर साँस
वो भी डर-संभल कर

सुर्खियाँ बेजान-सी हैं
मर गया जैसे लवारा?



चिंताओं का बोझ-ज़िंदगी - अवनीश सिंह चौहान

सत्ता पर क़ाबिज़ होने को
कट-मर जाते दल
आज सियासत सौदेबाजी
जनता में हलचल

हवा चुनावी
आश्वासन के
लड्डू दिखलाए
खलनायक भी नायक बनकर 
संसद पर छाए

कैसे झूठ खुले, अँजुरी में-
भरते गंगा-जल

लाद दिए
पिछले वादों पर
और नये कुछ वादे
चिंताओं का बोझ-ज़िंदगी
कोई कब तक लादे

जिये-मरे, ये काम न आये,
बेमतलब, बेहल

वही चुनावी
मुद्दा लेकर
वे फिर घर आए
मन को छूते बदलावों के
सपने दिखलाए

हैं प्रपंच, ये पंच स्वयं के,
कैसे-कैसे छल



बाज़ार समन्दर - अवनीश सिंह चौहान

चेहरे पढ़ो
कि सबके सब हैं
अविश्वास के अक्षर

थर्मामीटर तोड़ रहा है
उबल-उबल कर पारा
लेबल मीठे जल का
लेकिन
पानी लगता खारा

समय उस्तरा है जिसको
अब चला रहे हैं बन्दर

चीलगाह जैसा है मंजर
लगती भीड़ मवेशी
किसकी कब
थम जाएँ साँसें
कब पड़ जाए पेशी

कितने ही घर डूब गए हैं
यह बाज़ार समन्दर

त्यागी है हंसों ने कंठी
बगुलों ने है पहनी
बागवान की
नज़रों से है
डरी-डरी-सी टहनी

दिखे छुरी को सेंदुर-जैसा
सूरज एक चुकंदर



फगुआ- ढोल बजा दे - अवनीश सिंह चौहान

हर कड़ुवाहट पर
जीवन की
आज अबीर लगा दे
फगुआ-ढोल बजा दे

तेज हुआ रवि
भागी ठिठुरन
शीत-उष्ण-सी
ऋतु की चितवन

अकड़ गई जो
टहनी मन की
उसको तनिक लचा दे

खोलें गाँठ
लगी जो छल की
रिहा करें हम
छवि निश्छल की

जलन मची अनबन की
उस पर
शीतल बैन लगा दे

साल नया है
पहला दिन है
मधुवन-गन्ध
अभी कमसिन है

सुनो, पपीहे
ऐसे में तू
कोयल के सुर गा दे



बदरा आए - अवनीश सिंह चौहान

धरती पर है धुंध 
गगन में 
घिर-घिर बदरा आए

लगे इन्द्र की पूजा करने
नम्बर दो के जल से
पाप-बोध से भरी 
धरा पर 
बदरा क्योंकर बरसे

कृपा-वृष्टि हो
बेकसूर पर 
हाँफ रहे चैपाए

हुए दिगम्बर पेड़, परिन्दे-
हैं कोटर में दुबके
नंगे पाँव
फँसा भुलभुल में
छोटा बच्चा सुबके

धुन कजरी की
और सुहागिन का
टोना फल जाए

सूखा औ’ महँगाई दोनों
मिलते बाँध मुरैठे
दबे माल को
बनिक निकाले
दुगना-तिगुना ऐंठे

डूबें जल में
खेत, हरित हों
खुरपी काम कमाए



माँ - अवनीश सिंह चौहान

घर की दुनिया माँ होती है
खुशियों की क्रीम 
परसने को
दुःखों का दही बिलोती है

पूरे अनुभव
एक तरफ हैं
मइया के अनुभव
के आगे
जब भी उसके
पास गए हम
लगा अँधेरे में
हम जागे

अपने मन की
परती भू पर
शबनम आशा की बोती है
घर की दुनिया माँ होती है

उसके हाथ का
रूखा-सूखा-
भी हो जाता
है काजू-सा
कम शब्दों में
खुल जाती वह
ज्यों संस्कृति की
हो मंजूषा

हाथ पिता का
खाली हो तो
छिपी पोटली का मोती है
घर की दुनिया माँ होती है



नवगीत संग्रह ''टुकड़ा कागज का" को अभिव्यक्ति विश्वम का नवांकुर पुरस्कार 15 नवम्बर 2014 को लखनऊ, उ प्र में प्रदान किया जायेगा। यह पुरस्कार प्रतिवर्ष उस रचनाकार के पहले नवगीत-संग्रह की पांडुलिपि को दिया जा रहा है जिसने अनुभूति और नवगीत की पाठशाला से जुड़कर नवगीत के अंतरराष्ट्रीय विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। सुधी पाठकों/विद्वानों का हृदय से आभार।