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Monday, 1 July 2024

नवगीत संग्रह : एक अकेला पहिया — अवनीश सिंह चौहान


अवनीश जी की कहन भंगिमाओं में मानवता की पुख्ता जमीन दिखाई देती है, किंतु उस पर उग आए विरोधाभासी कैक्टसों के विरुद्ध उनकी आवाज भी दर्ज है। अधिकांश नवगीतों का स्वर व्यंग्यात्मक है, जिसके पीछे लक्ष्यार्थ झलकता है। संग्रहीत रचनाओं से देश-समाज का कोई भी परिदृश्य छूटा नहीं है। वहाँ शैक्षिक जगत, आभासी दुनिया, राजनीतिक व्यवस्था, स्त्री-विमर्श और प्रेम-प्रकृति आदि के विसंगत व्यापार हैं, जिसको कवि ने खुली आँखों से देखा है। ये नवगीत अंधकार को चीरते हैं और प्रकाश में कुछ अप्रस्तुत दिखलाते हैं। आपका एक नवगीत है— 'अँगुली के बल' — दुनिया का सारा इतिहास, सारे बही-खाते आदि सब इंटरनेट पर आ गए हैं। बस 'की बोर्ड' पर अँगुली चलाने की देर है। लेकिन अवनीश जी यह भी कहते हैं— "बातों से बातें निकलीं/ हल कोई कब निकला है" ('एक अकेला पहिया' : 47) और व्यस्तता इतनी कि "इंतजार करते-करते ही/ हार गयी मृगनैनी” (48)।

शब्द इतना सस्ता पहले नहीं था। शब्द के सस्ता होने से व्यक्ति अब संवेदनहीन भी हुआ है। शब्द सूचना मात्र रह गया है। पठन-पाठन 'तोता रटंत' हो गया। जाप (कर्म) को सिद्ध करने वाला अब वह मन नहीं है। लगन, निष्ठा और पवित्रता का अभाव है। 'संशय है' नवगीत में कवि कहता है— 

शोधों की गति घूम रही 
चक्कर पर चक्कर 
अंधा पुरस्कार 
मर-मिटता है शोहरत पर 

संशय है 
ये साधक 
सिद्ध करेंगे जाप। (‘एक अकेला पहिया’ : 46)
— वीरेंन्द्र आस्तिक,  वरिष्ठ कवि व आलोचक

लौकिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए मनुष्य को अकेले ही अपने कर्तव्यपथ पर चलना होता हैं, क्योंकि कर्तव्य ही उसे आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करता है और विषम परिस्थिति आने पर पथविचलित होने से उसकी रक्षा करता है— "कर्तव्येन कर्ताभि रक्षयते" (महाभारत, भीष्म पर्व, 58.27)। हाँ, अकेले चलते-चलते अगर कारवाँ बन जाए, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं— "मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर / लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया" (मजरूह सुल्तानपुरी)। ऐसी स्थिति में इसे 'स्व' से ''सर्व' का विस्तार भी कहा जा सकता है। इसी विस्तार को रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी एक कविता— "एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे" में करीने से रेखांकित किया हैं। इस कविता में रवीन्द्र जी संसार से भाग कर किसी अंधेरी गुफा में बैठने की बात नहीं करते, बल्कि जीवन में संघर्ष करते हुए अपने कर्तव्यपथ पर अग्रसर रहने की प्रेरणा देते हैं। ऐसा करते समय मनुष्य को कर्ता होने के अहंकार से मुक्त होकर जहाँ सेवा, प्रेम व त्याग के मन्त्र को आत्मसात कर निःस्वार्थ भाव से जन-जन के कल्याण के लिए तत्पर रहना है; वहीं अनुशासन, स्वावलंबन, परिश्रम, धैर्य, लगन एवं साहस की पतवारों को हाथों में थामकर एक सजग नाविक की तरह संसार सागर के पार भी उतरना है। कुछ इस तरह— "दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ / बाज़ार से गुज़रा हूँ ख़रीदार नहीं हूँ” (अकबर इलाहाबादी)। 
— अवनीश सिंह चौहान

पुस्तक: एक अकेला पहिया (नवगीत-संग्रह) 
ISBN: 978-93553-693-90
कवि: अवनीश सिंह चौहान 
प्रकाशन वर्ष : 2024
संस्करण : प्रथम (पेपरबैक) 
पृष्ठ : 112
मूल्य: रुo 250/-
प्रकाशक: प्रकाश बुक डिपो, बरेली
फोन :  0581-3560114

Available At:
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प्रस्तुति :
ओम चौहान सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथ बिहार में बीएएलएलबी  पाठ्यक्रम के छात्र हैं। 

Ek Akela Pahiya (Hindi Navgeet)

Thursday, 13 June 2024

नवगीत संग्रह— "टुकड़ा कागज़ का" का तृतीय संस्करण


"अवनीश चौहान के सृजन में लघु में विराट की यात्रा के संकेत हैं, जहाँ उनकी काल्पनिक, भावुक और नैसर्गिक शक्तियों का, यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में समाजीकरण हुआ है। कहना चाहूँगा कि शक्ति का विलय (‘राम की शक्ति पूजा’ आदि के संदर्भ में) महाशक्ति में होना ही निराला का महाप्राण होना है। यहाँ ‘टुकड़ा कागज का’ अन्ततः मिट्टी में गुड़कर महाशक्ति में एक लय हो विलीन हो जाता है। इसी प्रकार कवि के कुछ गीतों में ‘दूब’ और ‘तिनका’ जैसी अति सामान्य चीजें असामान्य बनकर विराट बिम्ब का सृजन करती हैं।" 
— वीरेंन्द्र आस्तिक,  वरिष्ठ कवि व आलोचक

पुस्तक: टुकड़ा कागज़ का (नवगीत-संग्रह) 
ISBN: 978-93553-693-90
कवि: अवनीश सिंह चौहान 
प्रकाशन वर्ष : 2013, 2014, 2024
संस्करण : तृतीय (पेपरबैक) 
पृष्ठ : 116
मूल्य: रुo 199/-
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर
फोन : 0141-2503989, 09829018087

Available at AMAZON: CLICK LINK



समाचार प्रस्तुति :
ओम चौहान सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथ बिहार में बीएएलएलबी  पाठ्यक्रम के छात्र हैं। 

Tukda Kagaz Ka (Hindi Lyrics)

Friday, 24 March 2023

नवगीत : संवादों के सारांश — अवनीश सिंह चौहान


नवगीत : संवादों के सारांश

(Navgeet: Samvadon Ke Saransh)

लेखक : अवनीश सिंह चौहान 
प्रकाशन वर्ष : 2023 
पृष्ठ : 152, मूल्य : रु. 350/-
ISBN : 978-93-91984-32-8 
प्रकाशक : प्रकाश बुक डिपो, बरेली (उ.प्र.)
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"नवगीत विधा से संबंधित अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने तथा अपनी समझ को विकसित करने के लिए मैंने देश-दुनिया में प्रतिष्ठित चौदह नवगीतकारों— सत्यनारायण, मधुकर अष्ठाना, गुलाब सिंह, कुमार रवीन्द्र, मधुसूदन साहा, मयंक श्रीवास्तव, शान्ति सुमन, राम सेंगर, नचिकेता, वीरेन्द्र आस्तिक, रामनारायण रमण, बुद्धिनाथ मिश्र, रामसनेहीलाल शर्मा 'यायावर' तथा ओमप्रकाश सिंह से सन 2009 से 2022 के दौरान समय-समय पर विस्तार से 'ऑनलाइन' और 'ऑफलाइन' संवाद किया। नवगीतकारों के आयुक्रम के अनुसार रखे गए संवादों की इस सारगर्भित, सुनियोजित एवं दीर्घकालिक प्रक्रिया में जो उत्तर मिले, वे कई बार इतने व्यापक रहे कि उन सबको विज्ञ पाठकों के समक्ष जस-का-तस रखना, उचित नहीं लगा। इसलिए इस पुस्तक में 'सार-सार को गहिते' हुए उन सभी महत्वपूर्ण संवादों के सारांश ही संग्रहीत किये जा सके हैं। 

नवगीत के समर्पित शब्द-साधकों से हुए संवादों पर केंद्रित इस पुस्तक में जिस प्रकार के मौलिक, विविधतापूर्ण एवं समसामयिक विधागत प्रश्न दिए गए हैं, वैसे ही उनके उत्तर हैं। सटीक, सार्थक एवं उपयोगी। कहने का अभिप्राय यह कि भाषा बदलकर प्रश्नों को प्रस्तुत कर या प्रश्नों की पुनरावृत्ति कर नवगीतकारों से संवाद करने की विद्यमान परिपाटी से अलग हटकर इस पुस्तक में बहुआयामी एवं प्रासंगिक प्रश्नोत्तरों को संकलित किया गया है, ताकि विधागत बिंदुओं पर रोचक एवं रचनात्मक संवाद हो सके। इस पुस्तक में संग्रहीत संवाद कितने रोचक एवं रचनात्मक हैं, यह तो संवाद-रसिक ही बता सकेंगे— इसलिए करबद्ध होकर यह सब उन्हीं पर छोड़ता हूँ। इन सभी संवादों के दौरान प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों-प्रकाशकों सहित जिन सहयात्रियों एवं सुधीजनों का स्नेह और सहयोग मिला है, उन सबके प्रति मैं श्रद्धावनत हूँ।" — अवनीश सिंह चौहान 
Navgeet Samvadon Ke Saransh by Abnish Singh Chauhan

Thursday, 16 September 2021

'नवगीत वाङ्मय' पर विद्वानों की टिप्पणियाँ


[अवनीश सिंह चौहान, नवगीत वाङ्मय (Navgeet Vangmay), प्रकाशक : ऑथर्सप्रेस, नई दिल्ली (भारत), प्रकाशन वर्ष : 2021, पृष्ठ : 174, मूल्य : रु. 200/- (After Discount), ISBN : 978-93-5529-004-5]
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'नवगीत वाङ्मय' (ऑथर्सप्रेस, नई दिल्ली) के एमाजॉन पर रिलीज होने की सूचना जब सोशल मीडिया (विशेषकर 'पूर्वाभास', 'क्रिएशन एण्ड क्रिटिसिज्म', 'फेसबुक', 'व्हाट्सएप्प' आदि) में शेयर की गयी तब 500 से अधिक हिंदी और अंग्रेजी भाषी विद्वानों/ सुधीजनों के बधाई/ शुभकामना सन्देश प्राप्त हुए, जिसके लिए हम उन सभी का हृदय की गहराइयों से आभार व्यक्त करते हैं। 

उन सभी बधाई/ शुभकामना संदेशों को यहाँ रख पाना संभव नहीं था, सो उनमें से कुछ संदेशों को चुनकर यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है:-

1. "संपादन-कला के मर्मज्ञ आचार्यों से अपने सतत जुड़ाव के कारण मैं यहाँ यह बात साधिकार लिख रहा हूँ कि डॉ अवनीश सिंह चौहान द्वारा संपादित— 'नवगीत वाङ्मय' में प्रयुक्त संपादन-कला वस्तुतः शिखर-चुम्बी है। शिखर-चुम्बी इसलिए कि इस पुस्तक में प्रस्तुत अभिव्यंजना के प्रत्येक पक्ष (नवगीतकारों का चयन, नवगीतों का चयन, सुगठित टिप्पिणियाँ, लेख, साक्षात्कार आदि) में संपादक ने जिस कौशल को प्रस्तुत किया है, वह सराहनीय ही नहीं, अनुकरणीय भी है। चयन व संपादन कला में दक्षता हेतु संपादक महोदय को मेरी बहुत-बहुत बधाई।" — डॉ विमल, वर्धमान (पश्चिम बंगाल) 

2. "प्रियवर प्रो (डाॅ) चौहान जी, आपके द्वारा संपादित— "नवगीत वाड़्मय" एक विलक्षण संकलन है। आपने नवीनतम पद्धति को अपनाते हुए विवेकपूर्ण ढंग से इस संकलन को चार खंडों में विभक्त किया है ताकि अतीत से अद्यतन नवगीत की दशा व दिशा को रेखांकित किया जा सके। गत दिनों नवगीत पर आधारित एक 'शोध प्रबंध' का मूल्यांकन करते हुए आपके (डाॅ अवनीश सिंह चौहान) नवगीतों का सन्दर्भ पढकर जिज्ञासा हुई कि इतने प्रख्यात, प्रतिभासंपन्न नवगीतकार को अवश्य पढना चाहिए। आपका सद्यः संकलन निस्सन्देह साहित्य जगत के लिए महत्वपूर्ण व उपयोगी सिद्ध होगा। इस हेतु आपको बहुत-बहुत बधाई, मंगलाशीष, मंगलकामनाएँ।" — प्रो (डॉ) पूर्णमल गौड़, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी, पंचकूला, हरियाणा सरकार

3. "ख्यात साहित्यकार, नवगीतकार अवनीश सिंह चौहान द्वारा संपादित समवेत संकलन- 'नवगीत वाङ्मय' अपेक्षाकृत कम पृष्ठों में अपेक्षित लक्ष्य को पूर्णत्व प्रदान करता है। सम्पादकीय विवेक तथा वस्तु-चयन, घनत्व तथा प्रस्तुति दोनों रूपों में यह ग्रंथ श्रेष्ठ है। पठनीय और सराहनीय है। बधाई एवं शुभकामनाएँ!" — गुलाब सिंह, प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)

4. "नवगीत के सरोकारों को व्यापक पटल देकर अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देने के लिए अवनीश जी का प्रयास महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है। एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब हिन्दी कविता का मेघाच्छन्न आकाश साफ होगा और छान्दसिक कविता के रूप में नवगीत हिन्दी कविता की प्रमुख पहचान बनेगा। उस दिन गीतकारों से अधिक इसके उद्धर्ताओं को याद किया जाएगा। अवनीश जी का नाम उस सूची में प्रमुख सात व्यक्तियों में होगा।" — डॉ बुद्धिनाथ मिश्र, देहरादून (उत्तराखण्ड)

5. "नवगीत की प्रगतिशीलता को एक नया आयाम देने वाली अद्भुत पुस्तक के लिए आपको आन्तरिक शुभकामनाएँ।" — डॉ मधुसूदन साहा, राउरकेला (उड़ीशा)

6. "नवगीत के विकास के इतिहास में इस पुस्तक का आदर के साथ उल्लेख किया जाएगा। आपके अनुभव, अध्ययन एवं संपादन की समन्वय दृष्टि 'नवगीत वाङ्मय' में देखने को मिलेगी। इस उपलब्धि के लिए हार्दिक बधाई।" — मयंक श्रीवास्तव, भोपाल (मध्य प्रदेश)

7. "आपके प्रयत्न सराहनीय हैं। हार्दिक शुभकामनाएँ।" — राम सेंगर, कटनी (मध्य प्रदेश)

8. "डॉ अवनीश सिंह चौहान एक मजे हुए साहित्यकार हैं। रचनाकारों द्वारा उनके कार्यों को सराहा गया है। यह पुस्तक भी एक नया कीर्तिमान स्थापित करेगी। इस कृति के लिए उन्हें बहुत-बहुत बधाई।" — वीरेन्द्र आस्तिक, कानपुर (उत्तर प्रदेश)

9. "बहुत-बहुत साधुवाद, प्रिय भाई। राधे-राधे। या तो पुस्तक या पुस्तक का सम्पूर्ण विवरण तत्काल मुझे भिजवाएँ। 'नवगीत कोश' का 'द्वितीय खण्ड' इससे सम्पन्न होगा।" — डॉ रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर', फिरोजाबाद (उत्तर प्रदेश)

10. "इस महत्वपूर्ण कृति में योगदान के लिए आपको और सम्मिलित रचनाकारों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ!" — डॉ ब्रह्मजीत गौतम, गाज़ियाबाद (उत्तर प्रदेश)

11. "युवा नवगीतकार, समीक्षक एवं श्रेष्ठ संपादक प्रियवर अवनीश सिंह चौहान के संपादन में "नवगीत वाङ्मय" शीर्षक से नवगीत संकलन प्रकाशित हुआ है। यह पुस्तक चार खण्डों में विभाजित है। प्रथम खण्ड— 'समारंभ' में तीन संस्थापक नवगीतकारों डॉ शम्भुनाथ सिंह, डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया व डॉ राजेन्द्र प्रसाद सिंह के तीन-तीन प्रतिनिधि नवगीत हैं, द्वितीय खण्ड— 'नवरंग' में नौ नवगीतकारों— क्रमश: गुलाब सिंह, मयंक श्रीवास्तव, शान्ति सुमन, राम सेंगर, नचिकेता, वीरेन्द्र आस्तिक, बुद्धिनाथ मिश्र, विनय भदौरिया व रमाकांत के नौ-नौ प्रतिनिधि नवगीत संकलित हैं, तृतीय खण्ड— 'अथबोध' में 'नये-पुराने' पत्रिका के यशस्वी संपादक, श्रेष्ठ समीक्षक, नवगीतकार दिनेश सिंह का गीत-नवगीत विमर्श पर केंद्रित सारगर्भित आलेख तथा चतुर्थ खण्ड— 'साक्षात्कार' में संपादक अवनीश जी द्वारा प्रतिष्ठित नवगीतकार डॉ मधुसूदन साहा से  नवगीत के संदर्भ की गई सार्थक वार्ता समाहित है। विश्वास है कि यह संकलन हिन्दी काव्यप्रेमियों के मध्य समादृत होगा तथा नवगीत की विकास यात्रा में अवनीश जी द्वारा किया गया यह श्रमसाध्य कार्य एक नया सोपान साबित होगा।" — डॉ विनय भदौरिया, रायबरेली (उत्तर प्रदेश)

12. "सचमुच यह पुस्तक नवगीत पर एक अद्भुत अभिलेख के रूप में सराही जायेगी। इस सृजन पर अवनीश जी को हार्दिक शुभकामनाएँ।" — राम अवतार सिंह तोमर 'रास', ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

13. "संपादकीय क्षमता और पुस्तकीय गुणवत्ता से ही यह संभव हुआ है। नवगीत के उन्नयन में योगदान के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।" — सूर्यदेव पाठक 'पराग', गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)

14. "बहुत ही सराहनीय कार्य। — डॉ लालताप्रसाद द्विवेदी 'अगम', गौरीगंज (उत्तर प्रदेश)

15. "आपकी साहित्य-सेवा अद्भुत है। हार्दिक बधाई, अवनीश जी।" — शीलेन्द्र कुमार वशिष्ठ, आगरा (उत्तर प्रदेश)

16. "एक समृद्ध साहित्यिक अवदान के लिए बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें भाई डॉ अवनीश सिंह चौहान जी।" — बृजनाथ श्रीवास्तव, कानपुर (उत्तर प्रदेश)

17. "बढ़िया काम। कवर भी अच्छा है। बहुत बधाई!" — रमाकांत, रायबरेली (उत्तर प्रदेश)

18. "श्रद्धेय दिनेश सिंह की छाँव में रहकर आपने नवगीत की जो साधना की है इस संचयन और सम्पादन में निश्चित ही उसका सुफल दमकेगा। एक महत्वपूर्ण कार्य के लिए साधुवाद एवं शुभकामनाएँ।" — राजेन्द्र सिंह ठाकुर, कटनी (मध्य प्रदेश)

19. "बिना किसी खेमेबाजी और पूर्वाग्रह के चुपचाप नवगीत के लिए समर्पित अवनीश सिंह चौहान द्वारा संपादित यह संकलन निश्चित ही नवगीत के प्रति छायी धुंध को हटाने में अपनी सार्थक और अहम भूमिका का निर्वाह कर नवगीत के भविष्य की दिशा निर्धारित करने में सहायक सिद्ध होगा। आपको और संकलन में शामिल सभी नवगीतकारों को हृदय-तल से बधाई एवं कोटि-कोटि शुभकामनाएँ।" — रवि खण्डेलवाल, इंदौर (मध्य प्रदेश)

20. "इस श्रेष्ठ, सुन्दर कार्य के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें।" — विजय सिंह, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

21. "उत्तम कार्य किया है आपने। बहुत-बहुत बधाई अवनीश जी। हार्दिक शुभकामनाएँ भी।" — राजा अवस्थी, कटनी (मध्य प्रदेश)

22. "इस पुस्तक का स्वागत है।" — सौरभ पाण्डेय, प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)

23. "इस सुन्दर व महत्वपूर्ण कार्य हेतु हृदयतल से शुभकामनाएँ, भैया।" — रविशंकर मिश्र, प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश)

24. "उम्मीद है कि आपके द्वारा संपादित यह पुस्तक आपकी अंग्रेजी में लिखित पुस्तकों की तरह आशातीत सफलता प्राप्त करेगी।" — मंजूषा तवासे, इंदौर (मध्य प्रदेश)


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Navgeet Vangmay ed. by Abnish Singh Chauhan

Thursday, 12 October 2017

नये प्रयोगों से लैस गीत-संग्रह 'टुकड़ा काग़ज़ का' - सुधांशु जी महाराज


विश्व जागृति मिशन : आनंद धाम, दिल्ली में अन्तरराष्ट्रीय गणेश-महालक्ष्मी महायज्ञ के अवसर पर परम पूज्य आचार्य श्री सुधांशु जी महाराज से मिलने का सौभाग्य पिछले शुक्रवार (अक्टूबर 06, 2017) को मिला। अवसर था श्रद्धेय देवेंद्र देव जी का गीत-संग्रह 'आवाज दे रहा महाकाल' का लोकार्पण।

लोकार्पण के पश्चात उदारमना, युग ऋषि सुधांशु जी महाराज से पुनः उनके आश्रम के एक कक्ष में मुलाकात हुई, तो इच्छा जगी कि उन्हें अपना गीत संग्रह #टुकड़ा-काग़ज़-का# (बोधि प्रकाशन, जयपुर) भैंट कर दूं। भैंट किया। उन्होंने मेरे गीत संग्रह को सहर्ष स्वीकार किया और मुझे अपना आशीर्वाद दिया। कहा कि आपके गीतों में ताज़गी है, भाषा में प्रवाह है, शब्दों में नवीनता है, बिम्ब आकर्षक हैं। उन्होंने मेरे एक गीत 'बच्चा सीख रहा टीवी से/ अच्छे होते हैं ये दाग़' की कुछ पंक्तियां- "टॉफी, बिस्कुट, पर्क, बबलगम/खिला-खिला कर मारी भूख/माँ भी समझ नहीं पाती है/कहाँ हो रही भारी चूक। माँ का नेह/मनाए हठ को/लिए कौर में रोटी-साग/अच्छे होते हैं ये दाग़।" भी पढ़कर सुनायी। और कहा कि वह इस नये प्रयोगों से लैस गीत संग्रह को अपने साथ ले जा रहे हैं। आराम से पढ़ने के लिए। यह सब देख-सुन मैं गदगद हो गया।

कक्ष में उपस्थित आदरणीय आचार्य देवेन्द्र देव जी, कविवर क्रान्त एम एल वर्मा जी, अग्रज कवि शम्भू ठाकुर जी, भाई अमर सोनी जी और उदितेन्दु 'निश्चल' जी की उपस्थिति ने बल दिया। इस आत्मीय प्रक्रिया में श्रद्देय श्री राम महेश मिश्र जी, निदेशक- कार्यक्रम एवं विकास, का ह्रदय से आभार।

- अवनीश सिंह चौहान


A Comment on Tukda Kagaz Ka by Sudhanshu Ji Maharaj

Monday, 14 October 2013

गीतों का उपहार - डेली न्यूज़




टुकड़ा कागज़ का अवनीश सिंह चौहान के चर्चित गीतों का संग्रह है जो विश्व पुस्तक प्रकाशन दिल्ली से आया है। 

समाचार पत्र: 
डेली न्यूज़ - हम लोग
जयपुर, 
रविवार, 3 फरवरी 2013
नवगीत संग्रह ''टुकड़ा कागज का" को अभिव्यक्ति विश्वम का नवांकुर पुरस्कार 15 नवम्बर 2014 को लखनऊ, उ प्र में प्रदान किया जायेगा। यह पुरस्कार प्रतिवर्ष उस रचनाकार के पहले नवगीत-संग्रह की पांडुलिपि को दिया जा रहा है जिसने अनुभूति और नवगीत की पाठशाला से जुड़कर नवगीत के अंतरराष्ट्रीय विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। सुधी पाठकों/विद्वानों का हृदय से आभार।