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Monday, 14 October 2013

संप्रेषणीय रचनाएँ - मधुकर अष्ठाना

अवनीश के गीतों को पढ़कर लगता है कि उनके पास अनुभूतियों एवं शब्दों का वृहद् कोश है। सहज प्रतीकों, टटके बिम्बों और अभिधा भाषा का सन्तुलित प्रयोग उनकी रचनाओं को संप्रेषणीय एवं सुगम्य बना देता है। प्रायः छोटे-छोटे छन्द और न्यूनतम शब्दों में कथ्य को निरुपित करने की कला में निपुण इस कवि के गीतों में जहाँ वैश्विक सौहार्द्र दिखाई पड़ता है, वहीं सामाजिक विसंगतियाँ और विद्रूपताएँ भी चित्रित हैं। मेरी कामना है कि अवनीश चैहान महासिन्धु से विशाल हों और नागराज से शिखरस्थ हों।


- मधुकर अष्ठाना

विद्यायन, एस-एस- 108-109
सेक्टर-ई, एल डी ए कालोनी
कानपुर रोड, लखनऊ

उजले भविष्य का संकेत - माहेश्वर तिवारी


अवनीश चैहान के गीत ज़मीनी सच्चाई को करीने से उजागर करते हैं। तभी तो उनके गीतों में कही हुई बात आम आदमी को अपनी ही पीड़ा का गायन लगती है। उनके गीतों में बिम्ब पूर्ववर्ती कविता के समान अलंकृत अथवा रूढ़ नहीं हैं; बल्कि बिम्ब प्रयोग का वैविध्य और नवता दोनों हैं। यही कारण है कि अवनीश चैहान की रचनाधर्मिता उजले भविष्य का संकेत देती है।

- माहेश्वर तिवारी

हरसिंगार, ब/म-48
नवीन नगर 
मुरादाबाद-244001

हिन्दी नवगीत के समर्थ हस्ताक्षर - डॉ महेश ‘दिवाकर’


अवनीश सिंह चैहान एक विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग में असि॰ प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। एक शिक्षक और साहित्यकार उनके व्यक्तित्त्व में समाया है, जिसकी यथार्थ अभिव्यक्ति उनकी रचनाध्र्मिता की विशिष्टता है। गाँव से वे संपृक्त हैं, नगरों में वे रहे हैं और महानगर में रह रहे हैं; अतः तीनों की बहुआयामी अनुभूतियों ने उनके काव्य कलेवर को सजाया-संवारा है। मानव जीवन के यथार्थ द्रष्टा होने के बावजूद भी वे आदर्शवादी संचेतना के साहित्यकार हैं। जीवन-मूल्यों में उनकी गहन आस्था है। वे वसुधैव  कुटुम्बकम् की भावना के प्रबल पक्षधर हैं। यह तथ्य मैं नहीं उनकी रचनाएँ बोलती हैं।

साथ ही वे हिन्दी की नवगीत विधा के प्रबल समर्थक ही नहीं, अपितु सहज शिल्पी हैं। नवगीत के काव्यशिल्प सौष्ठव का उन्हें सम्यक् ज्ञान है जिसका साक्ष्य ‘टुकड़ा कागज़ का’ में समाहित रचनाएँ हैं। निस्सन्देह, अवनीश चैहान द्वारा रचित यह काव्यकृति हिन्दी नवगीत विधा की एक महत्वपूर्ण कृति है और वे समकालीन हिन्दी नवगीत के एक समर्थ हस्ताक्षर है।                                                                                                                 
डॉ  महेश ‘दिवाकर’
संस्थापक-अध्यक्ष
अखिल भारतीय साहित्य कला मंच
मुरादाबाद-244001

एक प्रतिबद्ध नवगीतकार - प्रो अनिल जनविजय


अनिल जनविजय
   मास्को, रूस

अवनीश सिंह चैहान एक प्रतिबद्ध नवगीतकार हैं। भारतीय ग्राम्य परिवेश, प्रकृति और मानवता के प्रति गहरी गीतात्मक अनुभूति के धनी इस कवि के पास अनुभव और दृष्टि के साथ लयात्मकता का वह अजस्त्र स्रोत है, जो देखे हुए यथार्थ को नए रूपों में प्रस्तुत करता है। सघन सामाजिकता के साथ शब्द और लय की विरल संगति वाले इस कवि को मेरी सहस्त्र शुभकामनाएँ।



नये दौर के गीत - डॉ बुद्धिनाथ मिश्र


अवनीश मेरा अनुज और असीम सम्भावनाओं से युक्त प्रिय गीतकवि है। इसमें प्रतिभा भी है, दृष्टि भी और दीर्घकाल तक तपने का धैर्य व सामर्थ्य भी। अवनीश गीत लिखते भी हैं और गीत विधा की परवरिश की चिन्ता भी करते हैं। यह अपने में बड़ी बात है। इन्होंने अपनी विशेषज्ञता का लाभ उठाकर अनेक वेबसाइटों पर गीत और गीतकारों की प्रतिष्ठा की है, उन्हें वैश्विक मंच दिया है। इनकी वेब-पत्रिका ‘गीत-पहल’ और ‘पूर्वाभास’ अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो चुकी हैं। दूसरी ओर इनकी अंग्रेजी कविताएँ विदेशी काव्य-संग्रहों में संकलित हो चुकी हैं। ऐसे व्यापक रसूख वाले युवक का हिन्दी गीत के सृजन में लगना सचमुच आह्लादकारी है। इनमें दुलर्भ कोटि की विनम्रता है, वर्तमान को सँवारने की लालसा है और भविष्य में कदम रखने की उत्कंठा है। 

‘टुकड़ा कागज़ का’ अवनीश चैहान का पहला गीत-संग्रह है। इनका उद्देश्य कथ्य और काव्य-भाषा में नवीनता लाने का है। इसमें ये सफल भी हुए हैं। इन गीतों में तमाम नये परिदृश्य और प्रतीकात्मक शब्द आये हैं, जो वर्तमान समाज से रचनाकार के गहरे सरोकारों के गवाह हैं। ये गीत हमारे सामने हेलीकाप्टर, कैटवाक, कप्टीशन, गाला महफिल, मिसकाल, चकाचौंध, कैफे़ आदि न जाने कितने आधुनिक सन्दर्भों की बात करते हैं, जिनसे आज तक हिन्दी गीत लगभग अछूता रहा। साथ ही ‘चलता है हल / गुड़ता जाए / टुकड़ा कागज़ का’, ‘चीलगाह जैसा है मंजर / लगती भीड़ मवेशी’, ‘बिना टिकट / छुन्ना को पकड़े / रौब झाड़कर / टीटी अकड़े’- ये पंक्तियाँ शौकिया नहीं लिखी जा सकतीं। इनमें गहन अनूभूति है, सूक्ष्म दृष्टि है और बिना किसी संकोच के अपारम्परिक शब्दों को अपनाने की प्रवृत्ति है।

कुल मिलाकर अवनीश के ये गीत नये दौर के गीत हैं। मन इनका भी अपने पुराने गाँवों में रमता है, मगर विसंगतियों के काँटे केले के नये पत्ते की तरह कोमल मन को लहूलुहान कर देते हैं। फिर भी वे निराश नहीं है और तमाम ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों से गुजरने के बाद भी वे जीवन में हरापन ढूंढ ही लेते हैं। यह मेरा आकलन भी है और आशीष भी। 


- डॉ बुद्धिनाथ मिश्र

5/2 वसंत विहार एन्क्लेव
देहरादून- 248006

कविता मरे असंभव है - डॉ विमल


‘टुकड़ा कागज़ का’ गीत-संग्रह पलटते हुए एकाएक निम्नलिखित पंक्तियों पर दृष्टि ठिठक गई। पंक्तियाँ हैं- ‘चौतरफा है / जीवन ही जीवन / कविता मरे / असंभव है।’ इसी गीत में तमाम सारे उदाहरण भी हैं। घर है (मकान नहीं), माँ, बापू, भाई-बहिन हैं, तिनकों से निर्मित चिड़ियों का नीड़ भी है, गंगा में पानी की धरा है, खेतों में धनी-चूनर फैली हुई है, शिशुओं का किलकन है, बछरों की रंभन है- फिर कविता मरे तो क्यों? गीतकवि को इस विश्वास हेतु आलोचना-शिविर से हार्दिक बधाई। पहली बात तो यह कि गीत और कविता को एक मानकर कवि ने गीत को एक विस्तृत आधार-भूमि प्रदान की है और दूसरी बात यह कि रचना-परंपरा की पुरातन विरासत को पुनः अर्जित कर उसे सार्थक समकालीनता में पुर्नस्थापित कर दिया है। कहना न होगा कि पाँचवे दशक के बाद के सर्जन ने उसी प्रकार अपनी परंपरा से अपने को काटा जिस प्रकार भारतीय जनतंत्र की राजनीति ने अपने को स्वाधीनता-आंदोलन की विरासत से अलग किया। मिट्टी और जीवन से जोड़कर अपने सर्जन में कवि ने जो उर्जा भरी है, पूरा संग्रह उसका प्रमाण है।

कहीं सूनी पड़ी हुई परती की कोख को हरी करती हुई, तलवों से दबकर तलवों को गुदगुदाती हुई हरी घास है जो दुधारू गायों का ग्रास बनकर दूध्-दही माँ परस रही है; तो कहीं पर्वतों के कठोर वक्ष को तोड़ती हुई, वन-प्रान्तर की असम-विषम भू-भागों से गुजरती हुई, चट्टानों को तोड़ती-फोड़ती, टकराती-बलखाती प्रवाहित नदियाँ हैं। चिड़ियाँ हैं, चिरौटे हैं। उनका नैसर्गिक जीवन है, जीवन-संघर्ष है। गाँव हैं, ग्रामीण समाज है। पगडंडियाँ हैं, अठखेलियाँ हैं। फिर कविता मरे कैसे? असंभव है। सावधन! सभी उत्तमोत्तमों की मृत्यु की घोषणा करने वाले उत्तर आधुनिकतावादी कहीं सुन तो नहीं रहे हैं? क्या पता शेष जो ‘उत्तम’ बचे हैं, उनकी मृत्यु की घोषणा भी न कर दें। स्मरण रहे कि जब-जब जगत और जीवन के सौन्दर्य की आराधना हुई है, तब-तब श्रेष्ठ कलाएँ जन्मी हैं। जीवन-राग ने ही कला-सृष्टि में रंग और उर्जा भरी है। और, प्रकृति है जीवन का अक्षय सौन्दर्य-स्रोत। इस संग्रह की अपनी तमाम सृजनात्मक सीमाओं के बावजूद प्रकृति और जीवन का राग इसके गीतों की संजीवनी शक्ति है जो कवि और उसके सृजन की संभावनाओं को उजागर कर उपलब्धि अर्जित करती है। 


- डॉ विमल
भू॰पू॰ प्रोफेसर तथा अध्यक्ष, 
हिन्दी-विभाग
वर्धमान विश्वविद्यालय
वर्धमान, प॰ बं॰

भविष्य का नवगीत - शचीन्द्र भटनागर

सृजन-प्रतिभा किसी भाषा की गुलाम नहीं होती है; वह जिस माध्यम को अपना ले, अपनी छाप उसमें छोड़ती ही है। अवनीश सिंह चैहान आधा दर्जन से अधिक अंग्रेजी पुस्तकों के लेखक-सहलेखक रहे हैं। उन्होंने अंग्रेजी भाषा में कविताएँ लिखी हैं; अंग्रेजी नाटक तथा कविताओं का हिंदी अनुवाद भी किया है। इसके साथ उल्लेखनीय यह भी है कि उनके गीत-नवगीत हिंदी की दर्जनों पत्रिकाओं, वेब पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उनकी प्रथम मौलिक कृति ‘टुकड़ा कागज़ का’ प्रकाशित हो रही है। ‘अन्तरराष्ट्रीय कविता कोश सम्मान’ एवं मिशीगन- अमेरिका का ‘बुक आफ द यीअर अवार्ड’ का प्राप्तकर्ता एवं भारत से प्रकाशित ‘स्पीचेज् आॅपफ स्वामी विवेकानन्द एण्ड सुभाषचन्द्र बोस: ए कम्परेटिव स्टडी’ तथा जर्मनी से प्रकाशित ‘राइटिंग स्किल्स’ के चर्चित लेखक तथा प्रतिष्ठित हिंदी गीतकार डॉ बुद्धिनाथ मिश्र की रचनाधर्मिता पर आधरित विशेषांक का संपादक अब ‘टुकड़ा कागज़ का’ के माध्यम से हिंदी गीतिकवियों एवं काव्यप्रेमियों के आशीर्वाद, स्नेह, सम्मान का पात्र भी बन गया है।

‘टुकड़ा कागज़ का’ अवनीश के 44 नवगीतों का संग्रह है। विपरीतताओं-विसंगतियों को सहन करके उनसे निरंतर जूझते हुए रास्ता बनाने वाले कवि अवनीश का जीवन-सूत्र है- ‘मेरे मनुआं जीवन है तो / जीवन भर पड़ता है तपना।’ यही भोगा हुआ यथार्थ विविध् रूपों में उनके नवगीतों में प्रत्यक्ष हुआ है। ये नवगीत कभी ‘पेट की चोटों को’ व्यक्त  करते हैं तो कभी ‘भीतर की टीसों को’। कभी ‘फसादों-बहसों’ में उलझे शब्दों के निकास बनते हैं तो कभी ‘सिद्धजनों पर’ हँसते हैं। गाँव में शहरी सभ्यता के संक्रमण का भी उनमें चित्रण है; बाज़ारवाद के फलस्वरूप जीवन-शैली पर हावी होते विज्ञापनों का सम्मोहन है; पश्चिमी सभ्यता की दलदल में धँसे किशोर-युवामन की विवशता हैं; धर्म, शिक्षा, राजनीति एवं न्याय तक के क्षेत्र में फैला भ्रष्टाचार इनमें बार-बार मुखरित हुआ है। सामाजिक सरोकार के इन नवगीतों में प्रभावी अभिव्यक्ति के लिए अवनीश अनेक शैलियों का प्रयोग करते हैं। कहीं दो विपरीत स्थितियों के ‘कंट्रास्ट’ के माध्यम से वह अपनी बात को पाठक के मन की गहराई तक उतारते हैं तो कहीं प्रश्न प्रस्तुत करके पाठक को चिंतन के लिए विवश करते से प्रतीत होते हैं। कई बार उनकी कहन अन्योक्ति जैसी हो जाती है और तब वह चिड़िया को संबोधित करके कटु यथार्थ को बेधड़क प्रस्तुत कर देते हैं। प्रतीक उनके नवगीतों में अस्त्र बनकर उभरे हैं; अर्थलोलुप नेता, अधिकारियों के लिए ‘मारीच’, आर्थिक शोषकों के लिए ‘घड़ियाल’, आधुनिकता से सनी  जिंदगी के लिए ‘अजायबघर’ और प्यार, संस्कार, अपनापन लील जाने वाली शहरी सभ्यता के लिए ‘अजगर’ जैसे सटीक प्रतीकों के प्रयोग से भी अवनीश स्थिति को प्रभावी सघनता प्रदान करने में सफल होते हैं।

लोकसंपृक्ति, लोकसंवेदना, यथार्थ की अभिव्यक्ति तथा परंपरा के जीवंत तत्त्वों की पुनर्प्रतिष्ठा आज नवगीत की कुछ स्थापित विशेषताएँ हैं। आम आदमी की जिंदगी में आने वाली हर रुकावट उसका विषय है। आम आदमी की बोली उसकी भाषा है। अवनीश आम आदमी की जमात में से निकले हैं। अतः उनके नवगीतों में यह विशेषताएँ सहज रूप में समाहित हैं। न तो वहाँ गाँव के प्रति ‘नास्टेल्जिया’ है, न ही अंचलिकता के प्रति विशेष आग्रह-भाव है। उनमें विपन्नता की वेदना है, टूटते परिवारों की पीड़ा है, माँ-पिता की कृतज्ञ स्मृतियाँ हैं और है लोक-संस्कृति की गंध् से महकता बिलकुल अपना-सा लगता सहज वातावरण। अवनीश के नवगीतों के पात्र उनकी लोक-संपृक्तता में बहुत सहायक हैं। वहाँ रामभरोसे, कमेसुर, धुनिया, जखई बाबा और दाऊ हैं तो छुटकी बिटिया, छबिया, सुलेखा और मुनिया भी हैं। उनके द्वारा प्रयुक्त वस्तुएँ, स्थान और बोले गए संज्ञा-शब्द, क्रियाएँ एवं मुहावरे सब मिलकर एक ऐसे वातावरण की सृष्टि करते हैं जो लोक-संवेदना को गहनतर करने में सहायक होती है। वहाँ शिशु की किलकन है, बछडे़ की रंभन है, गुड़-धानी की महक है, ढोल बजाता फगुआ है, कजरी की धुन है, सुहागिन का टोना है, कोटर में  दुबके परिंदे हैं, दो बित्ते की पगडंडी है, दुधरू गैया है, चिड़िया-चिरौटे हैं।

‘टुकड़ा कागज़ का’ के नवगीतों की एक और विशेषता है। अवनीश में किसी मोड़ पर हताशा नहीं जनमती है। उनकी विधेयात्मक दृष्टि उन्हें आध्यात्मिक बना देती है। अपने चारों तरफ़ उन्हें जीवंतता पसरी दिखाई देती है और वह कह उठते हैं- ‘चैतरफ़ा है / जीवन ही जीवन / शिशु किलकन है / बछड़े की रंभन’ और तब वह पूरी आश्वस्ति के साथ गीत के उज्ज्वल भविष्य की घोषणा करने लगते हैं- ‘अर्थ अभी घर का जीवित है / माँ, बापू, भाई-बहनों से / चिड़िया ने भी नीड़ बसाया / बड़े जत़न से, कुछ तिनकों से / मुनिया की पायल / बाजे छन-छन / कविता मरे असंभव है।’ निश्चित रूप से यहाँ कविता से कवि का आशय गीति-कविता से है। विधेयात्मकता के अतिरिक्त समन्वय की प्रवृत्ति तथा लोकमंगल की भावना भी भारतीय आध्यात्म के महत्वपूर्ण घटक हैं। अवनीश की इस आकांक्षा में ‘नाव चले तो / मुझ पर ऐसी / दोनों तीर मिलाए’ उनकी समन्वयवादी दृष्टि स्पष्ट झलकती है और ये दो किनारे हैं नवगीत और जनगीत, जिन्हें अवनीश अपने काव्य-कौशल से समन्वित करने की कामना करते प्रतीत होते हैं। ‘टुकड़ा कागज़ का’ के कुछ गीतांश यदि जनगीत के विवाद- समर्थकों के समझ उद्धृत कर दिए जाएँ तो मुझे विश्वास है, उन्हें संतुष्टि ही प्रदान करेंगे। जब वह कामना करते हैं कि- ‘जहाँ-जहाँ पर रेत अड़ी है / मेरी धर बहाए / ऊसर-बंजर तक जा-जाकर / चरण पखार गहूँ मैं।’ तब उनकी लोक कल्याणकारी भावना व्यक्त होकर अवनीश की नवगीत-दृष्टि को अध्यात्म से आवेष्टित करती प्रतीत होती है।

अंततः ‘टुकड़ा कागज़ का’ के नवगीत अवनीश चैहान की असीम संभावनाओं को उजागर करने के साथ भावी नवगीत के उस स्वरूप की ओर भी संकेत करते हैं जब यथार्थ अध्यात्म के छोरों को स्पर्श करता हुआ प्रस्तुत होगा। ‘स्व’ का विस्तार किए बिना आदमी आत्मकेंन्द्रित होकर समाज के किसी काम का नहीं रहेगा और स्व का विस्तार ही अध्यात्म है।


शचीन्द्र भटनागर

द्वारा श्री अमित भटनागर 
कार्यालय
जिला विद्यालय निरीक्षक
मुरादाबाद- 244001

नवगीत संग्रह ''टुकड़ा कागज का" को अभिव्यक्ति विश्वम का नवांकुर पुरस्कार 15 नवम्बर 2014 को लखनऊ, उ प्र में प्रदान किया जायेगा। यह पुरस्कार प्रतिवर्ष उस रचनाकार के पहले नवगीत-संग्रह की पांडुलिपि को दिया जा रहा है जिसने अनुभूति और नवगीत की पाठशाला से जुड़कर नवगीत के अंतरराष्ट्रीय विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। सुधी पाठकों/विद्वानों का हृदय से आभार।