Tuesday, 15 October 2013

लौटे बचपन - अवनीश सिंह चौहान

अब न अजुध्या मन में बसती
अब न बगाइच वाला वह मन
कंकरीट के मकड़जाल ने
फाँस लिया है सादा जीवन

कभी पकड़ना अपनी छाया
कभी छाँह से डर कर रहना
कभी चाँद-तारों को चाहें 
कभी धूप के मोती चुनना

रस था आमों के झगड़ों में
कुट्टी में भी था अपनापन

छोटेपन के बाल-इशारे
माँ समझे या समझे बापू
जिनकी ओली ही लगती थी
सबसे ऊँचा सुन्दर टापू

गाँव किनारे जखई बाबा-
का वह चैपड़ था सिहांसन

धुक-धुक, धुक-धुक जी करता है
कितने फंदे, कितने धंधे 
चढ़ी जवानी देखे सपना
बोझिल झुके हुए हैं कंधे 

मन ही मन यह चाहूँ मुझमें
लौटे फिर से मेरा बचपन



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